करी भावना उत्पन् होतरी है और उससे राज््य व््यवस्था क्रीर् होतरी है । अगर हमारे शासक जनता में रिोध न पनपने दें, तो ्यह उस सम्य करी व््यवस्था को लागू करना हरी तो हुआ । दूसररी बात, राजा ्या उसके प्रतिनिधि वेष बदल कर राज््य में घूमा करते थे । जिस मकान में प्रकाश दिखाई देता था, वहाँ करी बात छिप कर सुनते थे कि कोई भूखा तो नहीं सो रहा है । भूखे के लिए भोजन व््यवस्था करना ्यह राज््य का कतवाव््य था हमारे ्यहाँ । आज जबकि अपने देश में जिम्मेदार प्रशासन है, लोककल््ययाणकाररी
लोकतंत् है, ्यह वसद्धांत लागू क््यों नहीं? ्यह तो हमाररी व््यवस्था में तो सहज हरी होना चाहिए था । इसके लिए विधे्यक लाना पड़े, ्यह तो हमारे लिए शमवा करी बात होनरी चाहिए ।
रामायर् के राजनीतिक सिद्ांत भी प्रासंगिक
रामा्यर् के सौिें सगवा में लिखा है कि भरत जब श्ररीराम से दं्डोकारण््य में मिलने आए हैं तो श्ररीराम उनसे कह रहे हैं कि राजा को अपराह्न में अच्छे कपड़े पहन कर राज््य करी मुख््य सड़कों
पर घूमना चाहिए और लोगों से मिलना चाहिए । वे बात कर रहे हैं कि आपके भरीतर का दुख-क्लेश प्रजा को नहीं दिखे । आपके व््यक्क्तत्ि से प्रजा प्रभावित हो और आप प्रजा से बात कर सकें । जब राजा प्रजा से सरीधे बात करेगा तो बरीच के अधिकाररी बरीच में ्डों्डोरी नहीं मार सकते । आज का राजा प्रजा से सरीधे संवाद नहीं करते । वे केवल मंच से बात करते हैं । राजा और प्रजा में पुल का काम करते हैं अधिकाररीगर्, पाव्टटियोों के कार््यकतावा आदि । ्ये राजा को जो समझाते हैं, राजा उस हिसाब से चलता है । ्यह हमाररी व््यवस्था नहीं रहरी है । हमारे ्यहाँ प्रशासन में जनता से सरीधा संवाद करना होता था, जिसे हमने आधुनिक भारत में नहीं माना । रामा्यर् के सौिें सगवा में और भरी बहुत कुछ है । कोषाध््यक् बनाने करी ्योग््यता क््यो हो, ्यह तक लिखा है । श्ररीराम भरत से कहते हैं कि जहाँ खदानों में खुदाइ्यां होतरी हैं, ्या जो दं्डो के स्थान हैं, जो कारागार हैं, वहाँ वन्युक्त वक्ये जाने वाले लोगों पर ध््यान रखो कि कृवत्म चररत् के लोग वहाँ स्थान नहीं पाएं । श्ररीराम भ्रष््टाचार होने के बाद नहीं, पहले से सवरि्य राजा हैं । भ्रष््टाचार होने से पहले हरी निगाह रखने के लिए कह रहे हैं । वे कहते हैं कि निगाह रखो कि कोई पैसे लेकर काम न कर रहा हो । क््या प्राचरीन भारत के इन राजनरीवतक वसद्धांतों को आज लागू करन करी आवश््यकता नहीं है?
प्राचीन ज्ञान— विज्ञान के उपयोग से होगी उन्नति
इसरी प्रकार हमारे ्यहाँ आ्युिरेद में जो वन्यम बताए गए हैं, हमने उनकरी उपेक्ा करी हुई है, इससे आज हम बरीमार पड़ रहे हैं । हम सूर््य करी उपासना इसलिए करते थे क््योंकि सूर््य हमाररी अधिकांश बरीमारियोों को ठरीक करता है । ऐसे और भरी ज्ान-विज्ान के विि्य हैं जिनका ्यवद आज उप्योग वक्या जाए तो देश का काफरी विकास हो सकता है, लोगों का काफरी कल््ययाण हो सकता है । शाररीरिक स्िास्थ््य से लेकर भौतिक उन्वत तक सभरी कुछ मिल सकता है और वह सब कुछ सामाजिक सद्भाव और प्राकृतिक प्यावािरर् को बचाते हुए । �
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