October 2026_DA | Page 37

समाज भी समझे जिम्मेदारी
नि: संदेह राज््य सरकारों एवं उनके पुलिस
प्रशासन को इसके लिए और सजग रहना चाहिए कि दलित ्या किसरी भरी कमजोर, वंचित तबके के व््यक्क्त के साथ किसरी भरी तरह का भेदभाव न हो, लेकिन इतनरी हरी जिम्मेदाररी समाज करी भरी तो है । क््या जालौर अथवा बुलंदशहर में जो कुछ हुआ, उसे रोकने के लिए सबसे पहले संबंधित गांव के असरदार लोगों को आगे नहीं
आना चाहिए था? आखिर कहां थे ब्लाक, पंचा्यत सदस््य और प्रधान जरी? इसरी तरह क््या उन लोगों को सवरि्य नहीं होना चाहिए था, जो हिंदू समाज करी एका करी बात करते हैं और इस पर जोर देते हैं कि दलित, आदिवासरी आदि हिंदू समाज का अविभाज््य अंग हैं? सवाल ्यह भरी है कि धमवागुरु गांव-गांव जाकर इसके लिए कोई अलख क््यों नहीं जगाते कि दवलतों, आदिवासियोों के साथ वैसा व््यवहार नहीं होना चाहिए, जैसा
होता है और जो सभ््य समाज को शवमवादा करने के साथ हिंदू समाज को कमजोर करने का काम करता है?
वहन्ददुओं की एकता पर आघात
समाज सुधार का काम केवल शासन- प्रशासन पर नहीं छोड़ा जा सकता । ्यह काम समाज और विशेष रूप से सामाजिक एवं धावमवाक नेताओं को भरी करना होगा । इसलिए
और भरी, क््योंकि आजादरी के बाद राजनरीवतक दलों के एजें्डोे से समाज सुधार बाहर हो ग्या है । आखिर हमारे घोषित-अघोषित शंकराचार््य और अन्द्य धमवागुरु करते क््या हैं? क््या वे भरी सरकारों के भरोसे हैं? क््या उन्दहें नहीं पता कि दवलतों करी अनदेखरी-उपेक्ा को रह-रहकर ब्यान करने वालरी घ्टनाएं हिंदू समाज करी एकता को क्वत पहुंचाने के साथ उन तत्िों को बल भरी प्रदान करतरी हैं, जो ्यह शरारतपूर््ण
अवभ्यान छेड़े हुए हैं कि दलित-आदिवासरी तो हिंदू हैं हरी नहीं । ्यह एक खतरनाक अवभ्यान है । ्यह एक हद तक सफल होता दिखता है और इसरी कारर् मरीव्डो्या के साथ अन्द्य मंचों पर दवलतों का उल्लेख इस तरह होने लगा है, जैसे वे हिंदू समाज का हिस्सा हरी न हों । इस अवभ्यान के अलावा एक अन्द्य अवभ्यान दलित-मुक्स्लम एका के नाम पर चल रहा है । ्यह भरी वैसा हरी खोखला-फजशी अवभ्यान है, जैसा मुहम्मद अलरी जिन्ा ने बंगाल के नेता जोगेंद्र नाथ मं्डोल के साथ मिलकर चला्या था । जिन्ा के छल का शिकार जोगेंद्र नाथ मं्डोल तो हुए हरी, जो शवमवादा होकर कलकत्ता लौ्टे और गुमनामरी में मर गए, बांग्लादेश के करोड़ों दलित हिंदू आज भरी हो रहे हैं ।
मानसिकता में बदलाव की आवश्यकता
दवलतों के साथ दुव््यवािहार करी उन घ्टनाओं पर भरी शासन-प्रशासन को कठघरे में खड़ा करना राजनरीवतक उद्ेश््यों अथवा अन्द्य किसरी एजें्डोे को पूरा करने में तो मददगार हो सकता है, जिनमें उनकरी कोई भागरीदाररी अथवा गलतरी नहीं होतरी, लेकिन ऐसा करने से समाज को चेताने और उसे उसकरी जिम्मेदाररी का अहसास कराने का उद्ेश््य कहीं परीछे छू्ट जाता है । जहां शासन-प्रशासन करी गलतरी हो, वहां उसे कठघरे में खड़ा हरी वक्या जाए, लेकिन जहां गलतरी समाज करी हो, वहां उसे भरी इसका आभास करा्या जाना आवश््यक है । वास्ति में ्यह काम केवल दवलतों, आदिवासियोों के साथ होने वालरी घ्टनाओं पर हरी नहीं, महिलाओं से छेड़छाड़ और दुष्कमवा के मामलों में भरी होना चाहिए । इस तरह करी घ्टनाएं पुलिस करी सजगता के अभाव में कम, लोगों करी उस मानसिकता के कारर् अधिक होतरी हैं, जिसके तहत वे लड़वक्यों- महिलाओं को नरीचरी निगाह से देखते हैं । इस अपेक्ा में कोई हजवा नहीं कि सरकारों को समाज सुधार के लिए और सवरि्य होना चाहिए, लेकिन समाज करी गलतरी केवल शासन-प्रशासन के सिर मढ़ने से बात बनने वालरी नहीं है । �
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