October 2026_DA | Page 30

साहित्य

सामाजिक समरसता क़े संवाहक: मैथिली लोकगीत

समाज, जीवन, प्रकृति और कालचक्र का हर पहलू है समाहित वमवर्िा में सनातन से प्रवित है लोकगीतों की धारा

सोनी चौधरी

सा

हित््य को समाज का दर््पण कहा ग्या है तो लोक संगरीत को धड़कन । लोकगरीत, लोक जरीिन का प्रार् है । कोई भरी मनुष््य ऐसा नहीं है जिसे गाना गाना ्या कम से कम गुनगुनाना न आता हो । ददवा और प्ररीति करी अधिकता को सहजता से उढेलने का काम अगर कोई करता है तो वह है गरीत गाना । लोक गरीत केवल गरीत हरी नहीं है । सामाजिक व््यवस्था को संचरित करने का एक प्रमुख आधार भरी है । लोक गरीत केवल अनुष्ठावनक, संस्कार, खुशरी, उमंग एवं वेदना में गाने ्या गुनगुनाने वालरी चरीज नहीं एक समाज करी समस्त जरीिन शैलरी का दपंर् भरी है । अगर लोक गरीत को सहरी ढंग से विवेचन वक्या जाए तो इतिहास, राजनरीवत, धमवा, दशवान, पारिवारिक सम्बन्दध, ज्ान-विज्ान, संस्कार इत््यावद सभरी चरीज करी जानकाररी लोक गरीत के द्ारा वक्या जा सकता है । मैथिल लोगों में लोकगरीत हमेशा एक महत्िपूर््ण पक् रहा है जो समृद्ध सांस्कृवतक विविधता में एकता का प्रतरीक है । ्यह प्रत््येक क्ेत् करी उत्कृष््टता
को दशावाता है । एक पीढ़़ी से दूसररी पीढ़़ी तक परंपराओं को पहुंचाने का काम करता है जिसे निरंतर आगे बढ़ाने करी जरूरत है ।
अनेकता में एकता का पहलू
कहने को तो दक्षिण में गंगा, पूरब में कोसरी, पक्श्चम में गं्डोकरी और उत्तर में हिमाल्य के बरीच का पूरा भू— भाग मिथिलांचल है । लेकिन ्यहां भाषाई और सांस्कृवतक हरी नहीं बक्ल्क प्राकृतिक विविधता भरी ऐसरी है जिसके बारे में कहावत है कि चार कोस पर पानरी बदले, आठ कोस पर वार्री । इन विधिताओं को जिन तत्िों ने एकता के धागे में समे्टा हुआ है उसमें वनक्श्चत तौर पर सबसे प्रमुख ्यहां के लोकगरीत हरी हैं । मिथिला के लोकगरीत सामाजिक समरसता के भरी संवाहक हैं और महिला सशक्क्तकरर् करी अवधारर्ा के साथ भरी गहराई से जुड़े हुए हैं । चुंकि मिथिला के जन— जरीिन और संस्कारों को लोकगरीत करी पुक्ष्पत— पल्लवित और स्पंवदत करते हैं लिहाजा इन लोकगीतोों पर महिलाओं के एकाधिकार के कारर् समाज और परिवार में महिलाओं को एक व््यािहारिक िचवास्ि स्ित: हरी हासिल हो जाता है । इसके अलावा लोकगीतोों में जाति करी वह दरीिार भरी कहीं नहीं दिखतरी जिसे तोड़ने का उपरिम तो हमेशा से होता रहा है लेकिन आज तक तोड़ा नहीं जा सका है । ्यहां तक कि मिथिला में सांप्रदाव्यकता के खांचों में भरी लोकगीतोों को समे्टा नहीं जा सकता है क््योंकि सोहर से लेकर
समदाउन तक हरी नहीं बक्ल्क बारहमासा, छहासा, चौमासा, चैता और ब्टगवनरी जैसे गरीत जितना वहन्ददुओं द्ारा गा्या जाता है उससे जरा भरी कम मुसलमानों द्ारा भरी नहीं गा्या जाता ।
होठों पर सजकर आत्मा में बस जाए
मैथिलरी लोकगीतोों में अक्सर मिथिला का इतिहास जो अति प्राचरीन है और ग्रामरीर् जनजरीिन करी झलक मिलतरी है । जनक नंदनरी सरीता करी जन््मस्थलरी मिथिला के लोकगीतोों में अधिकतर हर बे्टरी में सरीता और दामाद में राम करी छवि देखरी जातरी है जिससे विवाह के गीतोों करी उत्कृष््टता चरम पर होतरी है । विवभन् ऋतु के हिसाब से भरी इसका वर््णन वक्या जाता है जो उस क्ेत् करी सभ््यता संस्कृवत को दशावाता है । इसे इस प्रकार भरी कहा जा सकता है कि मैथिलरी लोकगरीत मिथिला विशेष होता है जो एक पीढ़़ी से दूसररी पीढ़़ी तक मैथिल परंपरा, संस्कार, जरीिन, मरर् और सामाजिक समरसता का संदेश देता है । इसका कोई वनक्श्चत वन्यम नहीं होता है बक्ल्क
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