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साहितय

असंतुष्ट हो जाता हूँ, मेरे चार पुरि होने पर जितना आनंद होता, उतना मुझे मेि़ी पु्तक के प्रसिद होने पर होता है ।“ बाबा साहब और पु्तकों का रि्ता कितना अ्टू्ट और लप्र्यकर है ्यह उपरोकत कथिन से ्पष्ट हो जाता है । बाबा साहब के पु्तक प्रेम उनक़ी साहित्य से मानवतावाद़ी विचारों क़ी अपेक्ा तथिा लेखक क़ी आम आदम़ी के प्रति विचार क़ी धारणा, कितऩी ्यथिाथि्तवाद़ी ओर ज़ीवोनमुख़ी है ्यह दिखाई देत़ी है ।”
डॉ. आंबेडकर का कहना है कि आम आदम़ी क़ी महत्ता से प्रेरणा लेकर लेखकों को लेखन करना चाहिए । वह कहते हैं,‘ अपऩी साहित्य क़ी रचनाओं में उदात्त ज़ीवन मूल्यों और सांस्कृतिक मूल्यों को परिष्कृत क़ीलजए । अपना लक््य ि़ीलमत मत रखिए । अपऩी कलम क़ी रोशऩी को इस तरह से परिवर्तित क़ीलजए कि गांव, देहातों का
अंधेरा दूर हो । ्यह मत भूलिए कि अपने देश में दलितों और उपेलक्तों क़ी दूलन्या बहुत बड़ी है । उसक़ी प़ीडा और व्यथिा को भि़ी-भांति जान ि़ीलजए और अपने साहित्य द्ािा उनके ज़ीवन को उन्त करने का प्र्यास क़ीलजए । उसमें िच्च़ी मानवता निहित है । बाबा साहब का साहित्यिक विचार मानवतावाद पर आधारित है ।’
वर्तमान सम्य में दुलन्या का अधिकांश सर्वश्ेष्ठ साहित्य आजाद़ी क़ी चाह के लिए ह़ी लिखा जाता है । अगर हम भारत़ी्य संदर्भ में बात करे तो ्यहां के दलित विष्यक साहित्य में भ़ी िलद्यों से प्रताड़ित, शोषित, दमित, पराजित दलितों क़ी आवाज और आकांक्ा व्यकत होत़ी है । दलित विष्यक साहित्य में सामाजिक
ऐतिहासिक, अनुभवों क़ी गहि़ी अभिव्यसकत और मानव ज़ीवन क़ी दशाओं के बारे में अपऩी अलग अंतर् दृष्टि है । इसमें विरोध एवं आक्रोश का ्वि है । इसमें रिाह्मणवाद़ी व्यवस्था से प़ीलडत और प्रताड़ित व्यसकत क़ी आवाज सुनाई देत़ी है, इसमें व्यवस्था से आजाद़ी ्या ्वतनरिता के साथि समता और बंधुतव क़ी भावनओं क़ी गहि़ी अभिव्यसकत मिलत़ी है ।
अतः वर्तमान में हिन्दी दलित विष्यक साहित्यकार अपऩी धारदार कलम से कविता, कहाऩी, उपन्यास, ना्टक, सं्मिर, इतिहास एवं आलोचना आदि विधाओं के माध्यम से दलित एवं शोषित समाज को प्रकाश और ऊर्जा प्रदान कर रहे है । वर्तमान में हिन्दी दलित विष्यक साहित्य आनदोिन हिन्दी साहित्य क़ी मुख्यधारा बन चुका है । दलितों क़ी प्रतिष्ठा, सममान और
डॉ. आंबेडकर का कहना है कि आ्म आद्मी की ्महतिा से प्रेरणा लेकर लेखकों को लेखन करना चाहिए । वह कहते हैं,‘ अपनी साहितय की रचनाओं ्में उदाति जीवन ्मूलयों और सांस्कृतिक ्मूलयों को पररष्ककृत कीजिए । अपना लक्य सीह्म् ्म् रखिए । अपनी कि्म की रोशनी को इस तरह से परिवर्तित कीजिए कि गांव, देहातों का अंधेरा दूर हो ।
अस्मता, शिक्ा, संघर्ष और संग्ठन, तार्किक सोच आदि सब मुद्े जो मनुष्यता क़ी जरूि़ी शततें है, जिसे दलित विष्यक साहित्य उ्ठाता है । अतः दलित विष्यक साहित्यकार जहां अपऩी ककृलत्यों में समानता, भाईचारा और न्ि ्या रंग के आधार पर लकि़ी भ़ी विभेद को नकारता है, वहीं वह धर्म, धन, सत्ता, दर्शन और जनम के आधार पर लकि़ी श्ेष्ठता और निककृष्टता क़ी अवधारणा को भ़ी अस्वीकार है । इस प्रकार वह केवल दलित के लिए ह़ी नहीं वरन पूरे समाज के लिए इन विभेदों को लम्टाना चाहता है । डॉ. आंबेडकर का मानना है कि दलितों को स्वयं अपना नेतृतव विकसित करना चाहिए । दलित विष्यक साहित्य का नेतृतव निश्चत रूप से दलितों के हाथि में
होना चाहिए अन्यथिा वह अपना अिि़ी ्वरूप खो बै्ठेगा । ्यह़ी बात साहित्यिक संग्ठनों पर लागू होत़ी है । आज दलित विष्यक पलरिकाओं, दलित सममेिनों, गोसष्ठ्यों, सभाओं ने भ़ी सामाजिक चेतना के पक् में साथि्तक का्य्त कर परिवर्तन का मार्ग प्रश्त लक्या है ।
आज का दलित विष्यक साहित्यकार आधुनिकता बोध से अपने समाज, इतिहास और परमपिा का मूल्यांगन करके मानतावाद के लिए संघर्ष कर रहा है । आज जिन दलित विष्यक साहित्यकारों को डॉ. आंबेडकर ने जगा्या, चेता्या, शिक्ा का महतव समझा्या और दुलन्या को बदलने के लिए उसक़ी प्रस्थापित विषम व्यवस्था को तोड़ने का आह्ान लक्या । आज दलित विष्यक साहित्य के मूल में बोधिसतव डॉ. आंबेडकर का ज़ीवन दर्शन है । आज लभन्-लभन् प्रदेशों के लोग अपऩी- अपऩी प्रादेशिक भाषाओं में डॉ. आंबेडकर के सभ़ी आनदोिनों से प्रेरित होकर आतमकथिा, कविता, कहाऩी, उपन्यास, ना्टक, ग़ीत आदि लिखने लगे है ।
बौद धर्म स्वीकार करने से पूर्व ह़ी बोधिसतव डॉ. आंबेडकर ने त़ीन सूरि – लशलक्त बनो, संगल्ठत रहो, संघर्ष करो का नारा लद्या । आज दलित विष्यक साहित्य क़ी पृष्ठभूमि में ्यह त़ीनों सूरि विधमान है । अतः मानव मुसकत क़ी लड़ाई में डॉ. आंबेडकर ने भारत़ी्य समाज व्यवस्था पर ह़ी प्रश्न चिनह लगा लद्या । उनहोंने भारत़ी्य समाज व्यवस्था को नकारा ह़ी नहीं उसके विरुद संघर्ष भ़ी लक्या । उनके इनहीं विचारों में दलित विष्यक साहित्य के ब़ीज छिपे हैं । डॉ. आंबेडकर द्ािा समपालदत एवं प्रकाशित मूकना्यक, बहिष्कृत भारत, समता प्रबुद भारत इत्यादि पलरिकाओं में दलित चेतना के ्विों को प्रमुखता द़ी ग्य़ी । डॉ. आंबेडकर के इनहीं विचारों को दलित विष्यक साहित्य क़ी आिसमभक अवस्था कह़ी जा सकत़ी है । इनहीं पलरिकाओं द्ािा दलित विष्यक साहित्य के समबसनधत बहुत सा साहित्य प्रकाशन में आ्या । इसलिए डॉ. आंबेडकर को दलित विष्यक साहित्य का प्रेरणा स्ोत कहा जाता है । �
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