पता चलता है कि सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक दुलन्या में बौलदक लनलम्तलत्यों में बहुजन ना्यकों क़ी कितऩी अहम भूमिका रह़ी है ।‘ भारत़ी्य दलित आंदोलन का इतिहास’ के दूसरे भाग में पेरि्यार ई. व़ी. रामा्वाम़ी, ज्यदेव प्रसाद, राम्वरूप वर्मा, ललाई सिंह, बाबू मंगल सिंह ज्टाव, चंद्रिका प्रसाद जिज्ािु, जनकवि बिहाि़ी लाल, छ्रिपति साहू ज़ी महाराज, रमाबाई अंबेडकर, जा्यबई चौधि़ी से लेकर महाश्य भिखुलाल चौधि़ी तक ना जाने कितने ह़ी अस्मतावाद़ी ना्यकों के ्योगदान को वो हमारे सामने प्र्तुत करते हैं ।
अस्मितावादी इतिहास की ्महतवपूर्ण पुलस्काएँ
मोहनदास नैमिशरा्य अपने इतिहास लेखन में त़ीन सौ साल के बहुजन इतिहास को सामने रखने का प्र्यास करते हैं । वह बताते हैं कि सैकड़ों ऐसे दलित ना्यक और बुलदज़ीव़ी थिे जिनक़ी राषट् के निर्माण में अहम भूमिका रह़ी है पर मुख्यधारा के इतिहासकारों ने अपने ग्रन्थों में उनका जिक्र तक करना मुनासिब नहीं समझा । हमें ्यह पुस्तका राधाबाई कामबिे, तुलसाबाई बनसोडे, सुलोचनाबाई डोंगरे,
लक्म़ीबाई नाईक: पहि़ी भिक्खुणी, ग़ीताबाई गा्यकवाड, मिनामबाि शिवराज, कौसल्या बसंत्री, नलिऩी िढ़के, मुकता सालवे जाईबाई चौधि़ी, अंजऩीबाई देशभ्तार, विमल रोकड़े, मुकताबाई कामबिे, जे. ईश्वरी वाई, रजऩी तिलक, मुकता सर्वगोड, शांताबाई दाऱी, सखूबाई मोहिते पारवताबाई मेश्ाम, दम्यंत़ी देशभ्तार, चसनद्रका राम्टेके, शुदमत़ी बोंधा्टे, सुमन बंदिसोडे, भिक्खुणी चनद्रश़ीिा, बेब़ीताई कांबले शशिकला डोंगरदिवे लक्म़ी देव़ी ्टम्टा: प्रथिम दलित समपालदका, नागाममा और मलन्याममा आदि त़ीि-बत्त़ीि महिलाओं के ज़ीवन संघर्ष से रूबरू करवात़ी है । अस्मतावाद़ी इतिहास क़ी दृष्टि से ्ये पुस्तकाएँ बड़ी महतव क़ी हैं । इन पुस्तकाओं में बड़ी सहज और सरल भाषा में बहुजन ना्यकों के ज़ीवन संघर्ष क़ी महतवपूर्ण घ्टनाओं को साफगोई के साथि प्र्तुत लक्या ग्या है । इन पुस्तकाओं को इतिहास निर्माण के एक छो्टे प्रोजेक्ट के तौर भ़ी देखा जा सकता है ।
दलितों और लसत्यों के इतिहास की जानकारी
औपनिवेशिक भारत में सावित्री बाई फुले ने ्रि़ी शिक्ा और उसक़ी वैचारिक़ी को धार देने में बड़ी भूमिका निभा्य़ी थि़ी । औपनिवेशिक भारत में जब मिशनरि्यों क़ी तिफ़ से ्रि़ी शिक्ा के लिए जनाना ्कूि खोलने पर बल लद्या जा रहा थिा तो उि़ी सम्य जोत़ीिाव फुले ने स्रि्यों के वा्ते ्कूि खोले थिे । उन्नीसवीं सद़ी में ्रि़ी शिक्ा का ्यह प्र्यास लकि़ी बड़ी परिघ्टना से कम नहीं थिा । सावित्री बाई ने इन ्कूिों में बालिकाओं को पढ़ाने का काम लक्या थिा । उन्नीसवीं सद़ी में लकि़ी ्रि़ी का लशलक्का हो जाना मर्दवालद्यों के लिए बड़ी अचरज भि़ी बात थि़ी । मर्दवालद्यों क़ी ओर से उनहें अपमानित करने का प्र्यास भ़ी खूब लक्या ग्या थिा । सावित्री बाई फुले पुस्तका में मोहनदास नैमिशरा्य सावित्रीबाई फुले के ज़ीवन पर विविध पहलुओं पर सूरि रूप में प्रकाश डालते हैं । पहले तो मोहनदास नैमिशरा्य उनक़ी बौलदकता और
सृजन से पा्ठकों को तारुफ़ करवाते हैं । इसके बाद ्रि़ी वैचारिक़ी में उनक़ी भूमिका को रेखांकित करते हैं । औपनिवेशिक भारत में सावित्री बाई फुले ने सन 1852 में महिला मणडि का ग्ठन लक्या थिा । ्यह महिला अधिकारों और उनक़ी दावेदाि़ी का सवाल उ्ठाता थिा । इस मणडि के मंच से बालविवाह का विरोध और ्रि़ी शिक्ा का समथि्तन लक्या जाता थिा । मोहनदास नैमिशरा्य बताते हैं कि ्यह मणडि विधवा पुनर्विवाह का प्रबल पक्धर थिा । इि़ी कड़ी में इस वरिष्ठ लेखक क़ी दूिि़ी पुस्तका‘ हमने भ़ी इतिहास बना्या’ दलित ्रि़ी दृष्टि बड़ी महतवपूर्ण और मारक है । जो ्यह कहते हैं कि दलितों और स्रि्यों का अपना इतिहास नहीं है, उनहें ्यह छो्ट़ी ि़ी पुस्तका ज़रूर पढ़ऩी चाहिए ।
दलित चेतना का विस्ार करती पुलस्काएं
इस पुस्तका में पहि़ी दलित लेखिका मुकता सालवे के ज़ीवन पर कम शबदों में गंभ़ीि प्रकाश डाला ग्या है । इसके साथि ह़ी प्रथिम दलित संपादिका लक्म़ी देव़ी ्टामता के ज़ीवन संघर्ष से भ़ी परिचित करा्या ग्या है । मोहनदास नैमिशरा्य क़ी ्यह छो्ट़ी ि़ी पुस्तका बतात़ी है कि बाबा साहेब के निर्माण में उनक़ी महत़ी भूमिका रह़ी है । मोहनदास नैमिशरा्य का मत है कि माता रमाबाई साधारण ज़रूर थिीं, लेकिन उनके व्यसकततव के भ़ीतर असाधारण ततव थिे । मोहनदास नैमिशरा्य क़ी इतिहास लेखन क़ी ्यह कवा्यद बहुजन इतिहास लेखन क़ी प्रलक्र्या को लव्ताि देत़ी दिखा्य़ी देत़ी है । मोहनदास नैमिशरा्य क़ी ्ये पुस्तकाएँ अस्मतावाद़ी वैचारिक़ी क़ी दृष्टि से बड़ी महतवपूर्ण हैं । ्ये पुस्तकाएँ बहुजन समाज के बुलदज़ीलव्यों के ज़ीवन संघर्ष से तो परिचित करवात़ी ह़ी हैं और चेतना का लव्ताि भ़ी करत़ी हैं । इसमें कोई दो रा्य नहीं है कि मुख्यधारा का इतिहास लेखन बहुजनों के ्योगदान पर मौन रहा है । जबकि मोहनदास नैमिशरा्य क़ी ्ये पुस्तकाएँ बतात़ी हैं कि देश के निर्माण में बहुजनों का अमूल्य ्योगदान रहा है । �
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