Nov 2025_DA | Page 43

इसमें संदेह नहीं । कविता, कहाऩी, उपन्यास, निबनध, आलोचना आदि कई विधाओं में दलित साहित्य आज विकास कर रहा है, लेकिन अधिकांश क़ी दिशा ्पष्ट नहीं है, उसमें एक भ्टकाव दिखाई दे रहा है । नए दलित लेखकों में इतिहास और परमपिा का बोध है । परिणाम्वरूप, कुछ गैर-दलित, विशेष रूप से रिाह्मण लेखक दलितों पर लिखकर दलित लेखकों के ब़ीच समादृत हो रहे हैं । समादृत हो रहे हैं, कोई बात नहीं, क्योंकि दलित साहित्य कोई भ़ी लिख सकता है, पर वे नेतृतव भ़ी कर रहे हैं, ्यह दुखद है । ्यह हमारे इतिहास और परमपिा के विरुद है । कब़ीि और रैदास साहेब ने रिाह्मण का नेतृतव स्वीकार नहीं लक्या, और बाबासाहेब डा. आंबेडकर ने भ़ी दलित आनदोिन का नेतृतव लकि़ी गैर-दलित को नहीं लद्या थिा । हमें इस परमपिा को नहीं तोड़ना है । ्यह हमारे सौंद्य्तशा्रि क़ी परमपिा है, लकि़ी गैर-दलित का नेतृतव अगर हम स्वीकार करेंगे, तो वह हमाि़ी सौंद्य्त-चेतना को बदल सकता है । ्यह एक बड़ी चुनौत़ी है, दलित साहित्य के सामने । सवाल ्यह भ़ी है कि ्यह चुनौत़ी कैसे पैदा हुई? मुझे इसके प़ीछे अध्य्यन क़ी समस्या लगत़ी है । आज के अधिकांश नए दलित लेखक इतिहास और परमपिा को पढ़कर नहीं आए हैं, उनहोंने डा. आंबेडकर को भ़ी ्ठ़ीक से नहीं पढ़ा है, वे अगर डा. आंबेडकर क़ी ह़ी साि़ी रचनाओं को पढ़ लें, तो मुझे लव्वाि है कि वे एक नई चेतना और ऊर्जा से भर जा्येंगे । कोई चुनौत़ी फिर पेश नहीं आएग़ी । कोई नेतृतव उसे भ्टका नहीं सकेगा ।
सतत प्रवाहित प्राचीन परंपरागत धारा
दलित साहित्य और अमबेडकरवाद़ी साहित्य देखने में एक लगता है, पर, दोनों एक है नहीं । अलग-अलग हैं । आंबेडकरवाद़ी साहित्य क़ी अवधारणा डा. तेज सिंह ने द़ी थि़ी । वह माकि्तवाद़ी साहित्य से प्रभावित थिे, और उसक़ी प्रलतलक्र्या में आंबेडकरवाद़ी साहित्य रखना चाहते थिे । मैं उनक़ी इस अवधारणा से असहमत
थिा । इस पर मेरा एक लेख भ़ी छपा है । दरअसल जब हम आंबेडकरवाद़ी साहित्य कहते हैं, तो हम दलित साहित्य का दा्यिा ि़ीलमत कर देते हैं और आंबेडकर से पहले और बाद क़ी दलित चिंतन-धारा से क्ट जाते हैं । दलित साहित्य का उद्भव ्या जनम न तो डा. आंबेडकर से शुरू हुआ है, और न डा. आंबेडकर पर खतम होता है । इसक़ी सुद़ीघ्त परमपिा है, जिसमें पूि़ी अवैदिक धारा समाहित है । कब़ीि और रैदास साहेब ह़ी नहीं, बसलक उनसे भ़ी पहले के समतामूलक समाज के ्वप्नदशटी, शिलपकार और दार्शनिक इसके आधार-्तमभ हैं, ्यह परमपिा डा. आंबेडकर के आनदोिन और चिंतन से चेतनश़ीि और ऊर्जावान हुई है और आगे भ़ी ्यह वर्णव्यवस्था के समूल-नाश में सभ़ी भाव़ी दलित-बहुजन ना्यकों से प्रेरणा लेत़ी रहेग़ी ।
हिंदी दलित साहितय ्में सत्ी-हव्मश्ण का अभाव नहीं
ऐसा माना जाता है कि हिंद़ी दलित साहित्य में दलित ्रि़ी विमर्श का अभाव होता है । असल में ्यह दलित शिक्ा से जुड़ा हुआ मामला है । आज़ाद़ी के पचास साल गुजर जाने के बाद भ़ी
दलित जालत्यों में अशिक्ा भ्यानक ्ति पर थि़ी । गांवों में तो स्थिति और भ़ी बदतर थि़ी । शहरों में ्यह हाल थिा कि पूि़ी-पूि़ी बस्तियों में गिनत़ी के एक-दो परिवार ह़ी अपने बच्चों को पढ़ाने का साहस कर पाते थिे, वो भ़ी लड़कों को, िडलक्यों को फिर भ़ी नहीं पढ़ाते थिे । लड़के पहले पढ़े और िडलक्यां बहुत बाद में । इसे गि़ीब़ी कह ि़ीलजए, ्या पुरुषवाद़ी सोच कह ि़ीलजए ्या कुछ भ़ी, पर सच ्यह़ी है कि शिक्ा का प्रसार पुरुषों में पहले हुआ, इसलिए साहित्य में भ़ी दलित पुरुष ह़ी पहले आए । स्रि्यां बाद में आईं । लेकिन फिर भ़ी ्यह आरोप पूि़ी तरह सच नहीं है कि हिंद़ी दलित साहित्य में ्रि़ी-विमर्श का अभाव है । अनेक दलित कहालन्यों में ्रि़ी-विमर्श मौजूद है । ओमप्रकाश वाल्मीकि क़ी‘ अममा’, ज्यप्रकाश कर्दम क़ी‘ सांग’, कुसुम लव्योग़ी क़ी‘ और वह पढ़ गई’ ्रि़ी-विमर्श क़ी ह़ी कहालन्यां हैं । अज्य नावरि्या ने तो ्रि़ी-विमर्श क़ी कई कहालन्यां लिख़ी हैं । हालाँकि ्यह ्रि़ी-विमर्श उस ्ति का नहीं है, जो दलित लेखिकाओं के स्वयं के लेखन में उभरा है, पर हम ्यह नहीं कह सकते कि वहाँ एकदम अभाव है । अवश्य ह़ी पुरुष और ्रि़ी-चेतना क़ी दृसष्ट्याँ समान
uoacj 2025 43