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रिाह्मऱी के गर्भ से उतपन् होना, सं्काि, वेद श्वण, रिाह्मण पिता कि संतान होना, ्यह रिाह्मणतव के कारण नहीं है, बसलक सदाचार से ह़ी रिाह्मण बनता है ।( महाभारत अनुशासन पर्व 143 / 51)।
कोई मनुष्य कुल, जाति और लक्र्या के कारण रिाह्मण नहीं हो सकता । ्यलद चंडाल भ़ी सदाचाि़ी हो तो वह रिाह्मण हो सकता है ।( महाभारत अनुशासन पर्व 226 / 15)।
शंका 10- कया वेदों के अनुसार
शिलप विद्ा और उसे करने वालों को नीचा ्माना गया है?
समाधान- वैदिक काल में शिलप विद्ा को सभ़ी वरगों के लोग अपऩी अपऩी आवश्यकता अनुसार करते थिे । कालांतर में शिलप विद्ा केवल शुद्र वर्ण तक ि़ीलमत हो गई और अज्ानता के कारण जैसे शूद्रों को ऩीचा माना जाने लगा वैसे ह़ी शिलप विद्ा को भ़ी ऩीचा माना जाने लगा । जैसे ्यजुवचेद में लिखा है-वेदों में विद्ानों
( रिाह्मणों) से लेकर शूद्रों सभ़ी को शिलप आदि का्य्त करने का ्पष्ट आदेश है एवं शिल्पी का सतकाि करने कि प्रेरणा भ़ी द़ी गई है । जैसे विद्ान लोग अनेक धातु एवं साधन विशेषों से व्रिालद को बना के अपने कु्टुंब का पालन करते है तथिा पदार्थों के मेल रूप यज्ञ को कर पथ्य औषधि रूप पदार्थों को दे के रोगों से छुड़ाते और शिलप लक्र्या के प्र्योजनों को सिद करते है, वैसे अन्य लोग भ़ी लक्या करे ।( ्यजुवचेद 19 / 80 महर्षि द्यानंद वेद भाष्य)।
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