Nov 2025_DA | Page 33

स्माज भी स्मझे जिम्मेदारी
नि: संदेह राज्य सरकारों एवं उनके पुलिस
प्रशासन को इसके लिए और सजग रहना चाहिए कि दलित ्या लकि़ी भ़ी कमजोर, वंचित तबके के व्यसकत के साथि लकि़ी भ़ी तरह का भेदभाव न हो, लेकिन इतऩी ह़ी जिममेदाि़ी समाज क़ी भ़ी तो है । क्या जालौर अथिवा बुलंदशहर में जो कुछ हुआ, उसे रोकने के लिए सबसे पहले संबंधित गांव के असरदार लोगों को आगे नहीं
आना चाहिए थिा? आखिर कहां थिे बिाक, पंचा्यत सदस्य और प्रधान ज़ी? इि़ी तरह क्या उन लोगों को िलक्र्य नहीं होना चाहिए थिा, जो हिंदू समाज क़ी एका क़ी बात करते हैं और इस पर जोर देते हैं कि दलित, आदिवाि़ी आदि हिंदू समाज का अविभाज्य अंग हैं? सवाल ्यह भ़ी है कि धर्मगुरु गांव-गांव जाकर इसके लिए कोई अलख क्यों नहीं जगाते कि दलितों, आदिवासि्यों के साथि वैसा व्यवहार नहीं होना चाहिए, जैसा
होता है और जो सभ्य समाज को शर्मिदा करने के साथि हिंदू समाज को कमजोर करने का काम करता है?
हिन्दुओं की एकता पर आघात
समाज सुधार का काम केवल शासन- प्रशासन पर नहीं छोडा जा सकता । ्यह काम समाज और विशेष रूप से सामाजिक एवं धार्मिक नेताओं को भ़ी करना होगा । इसलिए और भ़ी,
क्योंकि आजाद़ी के बाद राजऩीलतक दलों के एजेंडे से समाज सुधार बाहर हो ग्या है । आखिर हमारे घोषित-अघोषित शंकराचा्य्त और अन्य धर्मगुरु करते क्या हैं? क्या वे भ़ी सरकारों के भरोसे हैं? क्या उनहें नहीं पता कि दलितों क़ी अनदेख़ी-उपेक्ा को रह-रहकर ब्यान करने वाि़ी घ्टनाएं हिंदू समाज क़ी एकता को क्लत पहुंचाने के साथि उन ततवों को बल भ़ी प्रदान करत़ी हैं, जो ्यह शरारतपूर्ण अलभ्यान छेडे हुए
हैं कि दलित-आदिवाि़ी तो हिंदू हैं ह़ी नहीं । ्यह एक खतरनाक अलभ्यान है । ्यह एक हद तक सफल होता दिखता है और इि़ी कारण म़ीलड्या के साथि अन्य मंचों पर दलितों का उलिेख इस तरह होने लगा है, जैसे वे हिंदू समाज का लह्िा ह़ी न हों । इस अलभ्यान के अलावा एक अन्य अलभ्यान दलित-मुस्िम एका के नाम पर चल रहा है । ्यह भ़ी वैसा ह़ी खोखला-िजटी अलभ्यान है, जैसा मुहममद अि़ी जिन्ा ने बंगाल के नेता जोगेंद्र नाथि मंडल के साथि मिलकर चला्या थिा । जिन्ा के छल का शिकार जोगेंद्र नाथि मंडल तो हुए ह़ी, जो शर्मिदा होकर कलकत्ता लौ्टे और गुमनाम़ी में मर गए, बांगिादेश के करोडों दलित हिंदू आज भ़ी हो रहे हैं ।
्मानसिकता ्में बदलाव की आवशयकता
दलितों के साथि दुर्व्यवहार क़ी उन घ्टनाओं पर भ़ी शासन-प्रशासन को क्ठघरे में खडा करना राजऩीलतक उद्े््यों अथिवा अन्य लकि़ी एजेंडे को पूरा करने में तो मददगार हो सकता है, जिनमें उनक़ी कोई भाग़ीदाि़ी अथिवा गलत़ी नहीं होत़ी, लेकिन ऐसा करने से समाज को चेताने और उसे उसक़ी जिममेदाि़ी का अहसास कराने का उद्े््य कहीं प़ीछे छू्ट जाता है । जहां शासन-प्रशासन क़ी गलत़ी हो, वहां उसे क्ठघरे में खडा ह़ी लक्या जाए, लेकिन जहां गलत़ी समाज क़ी हो, वहां उसे भ़ी इसका आभास करा्या जाना आवश्यक है । वा्तव में ्यह काम केवल दलितों, आदिवासि्यों के साथि होने वाि़ी घ्टनाओं पर ह़ी नहीं, महिलाओं से छेडछाड और दुषकम्त के मामलों में भ़ी होना चाहिए । इस तरह क़ी घ्टनाएं पुलिस क़ी सजगता के अभाव में कम, लोगों क़ी उस मानसिकता के कारण अधिक होत़ी हैं, जिसके तहत वे लड़कियों-महिलाओं को ऩीच़ी निगाह से देखते हैं । इस अपेक्ा में कोई हर्ज नहीं कि सरकारों को समाज सुधार के लिए और िलक्र्य होना चाहिए, लेकिन समाज क़ी गलत़ी केवल शासन-प्रशासन के सिर मढ़ने से बात बनने वाि़ी नहीं है । �
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