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निधि है । जाति-वयिसथा के अंतर्गत निम्नसतरीय समझी जाने वाली भंगी जाति में उनका जनम हुआ । यह बसती गाँव की मुखय बसती से दूर और बेहद गंदी बसती थी । इनकी बसती के ही पास लोग शलौच कर्म के लिए जाया करते थे । इनकी पूरी बिरादरी को निम्न और तुचछ समझा जाता था और इनसे अपमानजनक वयििार भी किया जाता था । वयिसथा इस तरह की थी कि ये लोग नए कपड़े नहीं पहन सकते थे और न ही जूते-चपपल पहन सकते थे । शिक्षा प्रापत करने में भी खुली छूट नहीं थी । जैसे-जैसे समाज में जागरूकता आने लगी वैसे-वैसे ही इनका परिवार भी पढ़ाई में अभिरुचि लेने लगा । परिणामसिरूप इनके पिता ने इनका दाखिला सकूल में करा दिया । जब ये सकूल जाने लगे तो जातिगत तानों से इनिें अपमानित किया जाने लगा । यहाँ तक दुर्भावना से ग्सत लोगों ने इनकी पिटाई भी की ताकि ये सकूल जाना छोड़ दें । इनके अलावा शिक्षकों द्ारा भी इनके साथ भेदभाव और दुवय्यवहार किया जाता था । शिक्षा का अभाव सदियों से दलित वर्ग की एक बहुत बड़ी समसया रही है । जागृति के अभाव में असपृ्यता के कारण दलितों का जीवन दो वक़त के भोजन की वयिसथा कर पाने के हनहमत् कोलिू के बैल की तरह शोषण की चपेट में घूमता रहा । ये शसथहतयाँ दलित आतमकथा में बखूबी अभिवयकत हुई हैं ।
यथार्थ परिस्थलतयों का बेबाक लचत्ण
जूठन आतमकथा में दलितों की दयनीय शसथहत का मार्मिक एवं यथार्थ चित्र देखने को मिलता है । अजमेर सिंह काजल के अनुसार,“ जूठन हिंदू समाज वयिसथा द्ारा जातियों के अंतिम सोपान पर शसथत चूहड़ा( जिसे आज वालमीहक कहा जाने लगा है) जाति के उतपीड़न- शोषण के साथ-साथ मनोवैज्ाहनक रूप से दमन करने के अनेक प्रकरणों से हमारा परिचय करवाती है । आतमकथा के प्रकरणों को पढ़ते- पढ़ते पाठक का मन पसीजने लगता है ।” ओमप्रकाश वालमीहक ने जूठन में समसत चूिड़ा
जाति की यथार्थ पररशसथहतयों का बेबाक चित्रण किया है । बरला गाँव में दलित बशसतयों को दूर बसाया जाता था । लेखक का जहाँ बचपन बीता उस परिवेश के भयावाह वातावरण के बारे में लेखक ने बेबाक टिपपणी की है । जूठन पूरी शिक्षा पद्धति और शिक्षकों की घिनलौनी मानसिकता को पूर्णतया उजागर करती है । शिक्षकों का भयावह रूप इस आतमकथा में उजागर होता है । ओमप्रकाश वालमीहक को अपने घर में सबसे छोटे होने की वजह से उनके पिता ने सदैव उनिें जातिगत कायषों से दूर रखा । वह सदैव यही चाहते थे कि उनका पुत्र शिक्षा प्रापत कर अपने और अपने परिवार को एक दिशा दे । इसी प्रबल इचछा से वे ओमप्रकाश वालमीहक को एक सरकारी सकूल में दाखिल कर देते हैं परंतु उस विद्यालय में भी जातीय भेदभाव व छुआछूत को मानने वाले जातिवादी मानसिकता के शिक्षक मलौजूद थे जो न केवल दलित बच्चों से घृणा करते बशलक उनका शोषण भी करते थे । अजमेर सिंह काजल के अनुसार,“ जूठन में दलित विद्यार्थियों के प्रति अधयापकों के रिूर वयििारों का उदघाटन हुआ है ।” गाँव के सकूल का वातावरण दलित बच्चों के लिए अतयंत यातनामय था जहाँ सकूल से बच्चों को भगाने के लिए शिक्षक तरह-तरह के हथकंडे अपनाते थे । दलित बच्चों को शारीरिक और मानसिक रूप से इतना प्रताहड़त किया जाता ताकि वह दोबारा सकूल का रुख ही ना करें । अपनी आतमकथा में ओमप्रकाश वालमीहक लिखते हैं कि,“ शिक्षकों का आदर्श रूप जो मैंने देखा वह अभी तक मेरी समृहत में मिटा नहीं है । जब भी कोई आदर्श गुरु की बात करता है तो मुझे भी तमाम शिक्षक याद आते हैं जो मां-बहन की गालियाँ देते थे । सुंदर लड़कों के गाल सहलाते थे और उनिें अपने घर बुलाकर उनसे वाहियातपन करते थे ।” यह भी एक प्रमुख कारण रहा है जिसकी वजह से दलित समाज में शिक्षा का विसतार नहीं हो सका । दलित चिनतक सुभाष चनद्र के अनुसार-“ ओमप्रकाश वालमीहक ने इस कथित‘ पहचान के संकट’ पर‘ जातिगत’ हीनता-बोध पर विजय पाई है । उनिोंने योगयता
प्रतिभा, संघर्षशीलता से अपनी मानवीय पहचान बनाई, न कि वंशगोत्र में संस्कृत निष्ठता का पुट डालकर या‘ मुखयधारा’ के अनय किसी पाखणड को अपनी पीठ पर लादकर । वालमीहक ने इस मिथक-भ्रम को तोड़ा कि‘ निम्न जातियों में प्रतिभा नहीं होती’,‘ शिक्षा-ज्ान से उनका कोई वासता नहीं ।”
समाज की शर्मनाक सच्ाई बेपर्दा
ओमप्रकाश वालमीहक ने अपनी आतमकथा में जातिवाद और कुशतसत मानसिकता के खिलाफ़ प्रतिरोध की आवाज बुलंद की है । अपनी आतमकथा में विद्यालय के हेडमासटर की मानसिकता को उजागर करते हुए ओमप्रकाश वालमीहक लिखते हैं,“ एक रोज हेड मासटर कालीराम ने अपने कमरे में बुलाकर पूछा, कया नाम है बे तेरा?” ओमप्रकाश । चूहड़े का है? हेड मासटर का दूसरा सवाल उछला … ठीक है … वह जो सामने शीशम का पेड़ खड़ा है उस पर चढ़ जा और टहनियाँ तोड़कर झाड़ू बना ले ।
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