संपादकीय
महिला आरक्षण और पांच राज्यों के चुनाव परिणाम
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हिला आरक्षण विधेयक के विरोध का सटीक परिणाम विपक्षी दलों को पांच राजयों में हुए विधानसभा चुनाव में भुगतना पड़ा है । पश्चम बंगाल, असम, पुंडुचेरी, तमिलनाडु एवं केरल में हुए विधानसभा चुनाव के परिणाम ने भारतीय जनता पाटटी( भाजपा) की राष्ट्रवादी राजनीति की बढ़ती सिीकार्यता को सभी के सामने रखा है, वही तृणमूल, द्रमुक और वामपंथी दलों की हिनदू समाज एवं राष्ट्र को तोड़ने की राजनीति को आम जनता, विशेष रूप से महिलाओं ने असिीकार कर दिया है ।
मुशसलम तुष्टिकरण एवं हिनदुओं पर अतयाचार की राजनीति के कारण पश्चम बंगाल में तृणमूल कांग्ेस को जिस आम जनता से दूर कर दिया, उसी आम जनता ने पूरे वि्िास के साथ सत्ा की चाभी भाजपा को सौंप कर सभी को आ्चय्यचकित कर दिया है । कांग्ेस से लेकर ममता सरकार के कार्यकाल में राजय की दलित जनता पर जिस तरह से अतयाचार किए गए, उसका परिणाम है कि अबकी बार विधानसभा चुनाव में दलितों के लिए आरक्षित सीटों पर भी भाजपा ने जबरदसत बढ़त बनाते हुए 68 सीटों में से 51 पर जीत हासिल करने में सफल रही, वहीं राजय में अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सभी सीटों को हासिल करके भाजपा ने राजनीतिक समीकरण ही बदल दिया है । राजय में मुशसलम तुष्टिकरण की पराकाष््ा के दुखद एवं घातक परिणाम हिनदू समाज को दशकों से भुगतने पड़े, जिनमें दलित एवं आदिवासी वर्ग की शसथहत अतयंत दयनीय रही । यह सिलसिला सितंत्रता के उपरांत से ही आरमभ हो गया था । कांग्ेस, वामपंथी एवं ममता के शासनकाल में दलित एवं आदिवासी वर्ग की जनता पीड़ित एवं शोषण का शिकार हुई । सितंत्रता के उपरांत अब तक पश्चम बंगाल में दलितों के लिए अलग से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के कलयाण के लिए कोई विभाग ही नहीं बनाया गया । पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के कार्यकाल में मैंने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति जनजाति आयोग के चेयरमैन के रूप में पश्चम बंगाल सरकार को अनुसूचित जाति एवं जनजातियों के कलयाण के लिए कई हनददेश दिए और जब उन हनददेशों पर धयान नहीं दिया गया, तो 2002 में मुझे बंगाल की वामपंथी सरकार को एक आपराधिक( हरिमिनल) सरकार कह कर संबोधित करना पड़ा था । फिलहाल राजय में हुए सत्ा परिवर्तन में दलित और आदिवासी वर्ग की महतिपूर्ण भूमिका को देखा जा सकता है, जो दशकों से सामाजिक एवं राजनीतिक समानता की राह देख रही है ।
दलित, आदिवासी और महिलाओं के महतिपूर्ण योगदान को असम में
भी देखा जा सकता है । राजय में भाजपा तीसरी बार सरकार बनाने जा रही है और राजय की 126 विधानसभा सीट में दलित वर्ग के लिए आरक्षित 19 एवं आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित 9 सीटें पर यानी सभी सीट पर भाजपा और उसके सहयोगी दलों ने जीत हासिल की है । उधर पुंडुचेरी में भाजपा नेतृति वाले राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन जीत हासिल करके सत्ा में पुनः वापसी की है । राजय में भाजपा को चार सीटों पर विजय हासिल हुई है ।
हिनदुओं को अपमानित करते हुए सनातन धर्म की तुलना डेंगू एवं कोरोना से करने वाले तमिलनाडु के पूर्व मुखयमंत्री एम. के. सटाहलन को अबकी बार चुनाव में आम जनता ने घर में बैठा दिया है । 1967 के बाद पहली बार राजय में द्रविड़ केंद्रित राजनीति से अलग कोई अनय दल सत्ा शिखर तक पहुंचा है । अभिनेता से नेता बने विजय की जीत अप्रतयाहशत तो कही जा सकती है, लेकिन सच यह भी है कि उनकी जीत के पीछे ईसाई-मुशसलम समीकरण के हावी होने के संकेत सपष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं ।
अबकी बार विधानसभा चुनाव के साथ ही वामपंथियों का अंतिम गढ़ भी छिन्न-भिन्न हो गया । केरल में दस िषषों से वामपंथी सरकार सत्ा में थी और यहां राजनीतिक परिवर्तन अि्यंभावी माना जा रहा था । राजय में भाजपा ने अपनी पकड़ और राजनीतिक पैठ को बढ़ाने में सफल हुई है । अबकी बार विधानसभा चुनाव में अपना अब तक का सर्वश्ेष्् प्रदर्शन करते हुए तीन सीटें( नेमोम, कझाकूट्टम और चथनूर) जीतकर भाजपा ने विधानसभा में पहली बार एक से अधिक सीटों का प्रतिनिधिति हासिल कर लिया है । लेकिन राजय में भाजपा द्ारा लगातार कई िषषों से किए जा रहे प्रयासों की कीमत अंततः वाम दलों को चुकानी पड़ी और केरल से विदाई के बाद अब किसी भी राजय में वामपंथी दल की सरकार नहीं रह गई है ।
फिलहाल चुनाव परिणामों से भाजपा को मिली बढ़त के साथ ही अब पाटटी अपना धयान उत्र प्रदेश, गुजरात, पंजाब सहित अनय उन राजयों के आगामी विधानसभा चुनाव पर केंद्रित करने की तैयारी कर रही है, जहां आगामी एक वर्ष के मधय राजय विधानसभा चुनाव होने हैं । तृणमूल कांग्ेस और द्रमुक की जबरदसत हार विपक्षी दलों और उनके कथित गठबंधन के लिए एक बड़ा झटका है, कयोंकि दोनों ही दल इस गठबंधन के प्रमुख घटक रहे हैं और उनकी हार से इस गठबंधन के आगामी संतुलन की दिशा एवं दशा को बदलेगी, इसमें कोई संदेह नहीं है ।
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