March 2026_DA | Page 47

मक्याः- विद्ा तप्च ्योमन्च एतद् ब्ाह्मण कारकम् । विद्ा तपोभ्यां ्यो हीनो जाति ब्ाह्मण एव
सः ।। 4 / 1 / 48 ।।
अर्थात् ब्ाह्मणति के तीन कारक हैं – 1) विद्ा, 2) तप और 3) ्योनि । जो विद्ा और तप से हीन है वह जात्या( ज्मना) ब्ाह्मण तो है ही ।
ऋषि द्यान्द ने प्रतिखंडन में मनु का ्यह
्लोक प्र्तुत मक्या- ्यरा काषठम्यो ह्ती, यश्चा चर्मम्यो मृगः । यश्च विप्रोऽनधी्यान्त््य्ते नाम बिभ्रति ।। मनु०( 2,157) अर्थात् जैसे काषठ का कटपुतला हाथी और चमड़े का बना्या मृग होता है, वैसे ही बिना पढ़ा हुआ ब्ाह्मण होता है । उकत हाथी, मृग और विप्र ्ये तीनों नाममात् धारण करते हैं
ऋषि द्यान्द से पूर्व और विशेष रूप से मध्यकाल से ब्ाह्मणों के अतिरिकत सभी िणथा्र व्यक्तियों को शूद्र समझा ग्या था, अतः क्रमशः मुगल और आंगल काल में महाराषट्र केसरी छत्पति शिवाजी महाराज, बड़ौदा नरेश स्याजीराव गा्यकवाड और कोलहापुर नरेश राजर्षि शाहू महाराज को उपन्यन आदि वेदोकत सं्कार कराने हेतु आनाकानी करनेवाले ब्ाह्मणों के कारण मानसिक ्यातनाओं के बीहड़ जंगल से गुजरना पड़ा था ।
ऋते ज्ानान्मुक्तः अर्थात् ज्ानी हुए बिना इ्सान की मुशकत संभव नहीं है । अतः ऋषि द्यान्द का दलितोद्धार की दृशषट से भी सब से महान् का्यथा ्यह था कि उ्होंने सबके साथ दलितों के लिए भी वेद-विद्ा के दरवाजे खोल दिए । मध्यकाल मे ्त्ी-शूद्रों के वेदाध्य्यन पर जो प्रतिबंध लगा्ये गए थे, आ्यथा समाज के सं्रापक महर्षि द्यान्द ने अपने मेधावी क्रांतिकारी चिंतन और व्यशकतति से उन सब प्रतिबंधों को अवैदिक सिद्ध कर मद्या । ऋषि द्यान्द के दलितोद्धार के इस प्रधान साधन और उपा्य में ही उनके द्ारा अपना्ये गए अन्य सभी उपा्यों का समावेश हो जाता है, जैसे-
1) दलित ्त्ी-शूद्रों को गा्यत्ी मंत् का
उपदेश देना । 2) उनका उपन्यन सं्कार करना । 3) उ्हें होम-हवन करने का अधिकार प्रदान करना । 4) उनके साथ सहभोज करना । 5) शैमक्क सं्राओं में शिक्ा ि्त् और खान पान हेतु उ्हें समान अधिकार प्रदान करना । 6) गृह्र जीवन में पदार्पण हेतु ्युवक-्युिमत्यों के अनुसार( अंतरजाती्य) विवाह करने की प्रेरणा देना आदि ।
डा. आंबेडकर ने भी ्िीकार मक्या है कि-‘‘ ्िामी द्यान्द द्ारा प्रतिपादित वर्णव्यि्रा बुद्धि गम्य और निरूपद्रवी है ।”
डा. बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाड़ा वि्िमिद्ाल्य के उपकुलपति, महाराषट्र के सुप्रसिद्ध वकता प्राचा्यथा शिवाजीराव भोसले जी ने अपने एक लेख में लिखा है,‘ राजपथ से सुदूर दुर्गम गांव में दलित पुत् को गोदी में बिठाकर सामने बैठी हुई सुकन्या को गा्यत्ी मंत् पढ़ाता हुआ एकाध नागरिक आपको दिखाई देगा तो समझ लेना वह ऋषि द्यान्द प्रणीत का अनु्या्यी होगा ।’
आ्यथासमाजी न होते हुए भी ऋषि द्यान्द की जीवनी के अध्य्यन और अनुसंधान में 15 से भी अधिक वर्ष समर्पित करने वाले बंगाली बाबू देवेंद्रनाथ ने द्यान्द की महत्ा का प्रतिपादन करते हुए लिखा है,‘ वेदों के अनधिकार के प्रश्न ने तो ्त्ी जाति और शूद्रों को सदा के लिए विद्ा से वंचित मक्या था और इसी ने धर्म के महंतों और ठेकेदारों की गद्दियां ्रामपत की थीं, मज्होंने जनता के मस्तषक पर ताले लगाकर देश को रसातल में पहुंचा मद्या था । द्यान्द तो आ्या ही इसलिए था कि वह इन तालों को तोड़कर मनुष्यों को मानसिक दासता से छुड़ाए ।’ ऋषि द्यान्द के काशी शा्त्ार्थ में उपस्रत पं. सत्यव्रत सामश्मी ने भी ्पषट रूप से ्िीकार करते हुए लिखा है,‘‘ शूद्रस्य वेदाधिकारे साक्ात् वेदवचनमपि प्रदर्शितं ्िामि द्यान्देन ्यरेमां वाचं ….. इति ।”
डा. च्द्रभानु सोनवणे ने लिखा है,‘ मध्यकाल में पौराणिकों ने वेदाध्य्यन का अधिकार ब्ाह्मण पुरुष तक ही सीमित कर मद्या था, ्िामी द्यान्द ने ्यजुिचेद के( 26 / 2) मंत् के आधार
पर मानवमात् को वेद की कल्याणी वाणी का अधिकार सिद्ध कर मद्या । ्िामीजी इस ्यजुिचेद मंत् के सत्यार्थद्रषटा ऋ़षि हैं ।’
ऋषि द्यान्द के बलिदान के ठीक 10 वर्ष बाद उ्हें श्द्धांजलि देते हुए दादा साहेब खापडडे ने लिखा था,‘ ्िामीजी ने मंदिरों में दबा छिपाकर रखे गए वेद भंडार सम्त मानव मात् के लिए खुले कर मद्ये । उ्होंने हिंदू धर्म के वृक् को महद् ्योग्यता से कलम करके उसे और भी अधिक फलदा्यक बना्या ।’
‘ वेदभाष्य पद्धित को द्यान्द सर्िती की देन’ नामक शोध प्रबंध के लेखक डा. सुधीर कुमार गुपत के अनुसार‘ ्िामी जी ने अपने वेदभाष्य का हिंदी अनुवाद करवाकर वेदज्ान को सार्वजनिक संपमत् बना मद्या ।’
पं. चमूपति जी के शबदों में‘ द्यान्द की दृशषट में कोई अछूत न था । उनकी द्याबल-बली भुजाओं ने उ्हें अ्पृ््यता की गहरी गुहा से उठा्या और आ्यथाति के पुण्यशिखर पर बैठा्या था ।’
हिंदी के सुप्रसिद्ध छा्यावादी महाकवि सू्यथाकांत मत्पाठी निराला ने लिखा है‘‘ देश में महिलाओं, पतितों तथा जाति-पांति के भेदभाव को मिटाने के लिए महर्षि द्यान्द तथा आ्यथाससमाज से बढ़कर इस नवीन विचारों के ्युग में किसी भी समाज ने का्यथा नहीं मक्या । आज जो जागरण भारत में दीख पड़ता है, उसका प्रा्यः समपूणथा श्रेय आ्यथा समाज को है ।’
महाराषट्र राज्य संस्कृति संवर्धन मंडल के अध्यक् मराठी वि्िकोश निर्माता तर्क-तीर्थ लक्मण शा्त्ी जोशी ऋषि द्यान्द की महत्ा लिखते हुए कहते हैं,‘ सैकड़ों िषयों से हिंदुति के दुर्बल होने के कारण भारत बारंबार पराधीन हुआ । इसका प्रत्यक् अनुभव महर्षि ्िामी द्यान्द ने मक्या । इसलिए उ्होंने ज्मना जातिभेद और मूर्तिपूजा जैसी हानिकारक रुमढ़्यों का निर् मूलन करनेवाले वि्िव्यापी महतिाकांक्ा ्युकत आ्यथाधर्म का उपदेश मक्या । इस श्ेणी के द्यान्द ्यमद हजार वर्ष पूर्व उतपन् हुए होते, तो इस देश को पराधीनता के दिन न देखने पड़ते । इतना ही नहीं, प्रत्युत वि्ि के एक महान् राषट्र के रूप में भारतवर्ष देदीप्यमान होता ।’ �
ekpZ 2026 47