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अमेरिका-ईरान विवाद अपराजेयता का अंत
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ध्य पूर्व का आसमान अब अमेरिकी कूटनीति के रंगों से नहीं, बशलक ईरानी मिसाइलों की लकीरों से रंगा हुआ है । दशकों से वैश्िक विमर्श इस धारणा पर टिका था कि अमेरिकी शशकत अपराजे्य है । लेकिन ईरान के निरंतर प्रतिरोध ने इस मनोवैज्ामनक भ्रम को चकनाचूर कर मद्या है । इ्लामी प्रतिरोध का ्यह सिलसिला न्या नहीं है । इसकी जडें 2006 के लेबनान ्युद्ध में मिलती हैं, जहां ईरान समर्थित सेना ने क्ेत् की सबसे आधुनिक सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर मद्या था । उस ऐतिहासिक प्रतिरोध से लेकर आज के अत्याधुनिक हमलों तक, ईरान ने ्यह साबित कर मद्या है कि पश्चमी महाशशकत से लडा जा सकता है । ्यह केवल एक सैन्य उपलशबध नहीं है, बशलक ्यह उस बुमन्यादी इ्लामी विचारधारा की वापसी है जो हमेशा से मौजूद थी, लेकिन कूटनीति के दबाव में दबी हुई थी ।
आज दुमन्या देख रही है कि जलॉड्टन, ममस् और सऊदी अरब जैसे देशों की आम मुस्लम जनसंख्या अपने शासकों पर अमेरिका से दूरी बनाने का दबाव डाल रही है । अगर एक देश ' काफिर ' ह्तक्ेपकारर्यों का मुकाबला कर
सकता है, तो पूरी ' उममा ' वाशिंगटन की गुलामी में क्यों रहे? ्यह भावना अब इंडोनेमश्या और मलेमश्या जैसे पूिजी एमश्याई देशों में भी फैल रही है, जबकि बांगलादेश में बढ़ता कट्टरपंथ भारत के चारों ओर एक रणनीतिक घेरा बना रहा है । इस उभरती हुई हकीकत में, पामक्तान के परमाणु हमर्यार पूरे इ्लामी गुट का सुरक्ा कवच बन जाएंगे, जिससे पश्चमी देशों के आर्थिक प्रतिबंध बेअसर हो जाएंगे क्योंकि ्यह देश आपस में ही तेल, गैस और तकनीक का व्यापार करेंगे ।
भारत के लिए इसके परिणाम बेहद घातक हो सकते हैं । क्मीर का विवाद अब केवल दो पड़ोसियों का मुद्ा नहीं रहेगा, बशलक ्यह एक वैश्िक धार्मिक गठबंधन का मुख्य एजेंडा बन सकता है । ईरान की सफलता और बांगलादेश के चरमपंथी उभार से उतसामहत होकर, कट्टरपंमर्यों को एक ' नई उममीद ' मिलेगी कि वह संवाद का रा्ता छोड दें और उस दिन का इंतजार करें जब एक एकजुट इ्लामी मोर्चा भारत पर दबाव बनाएगा । इसका असर खाडी देशों में काम करने वाले करीब एक करोड भारती्य श्मिकों पर भी पड़ेगा, जिनकी सुरक्ा भविष्य में उनकी धार्मिक पहचान से त्य हो
सकती है । भविष्य में, दुबई जैसे व्यापारिक केंद्र और समुद्री मार्ग भी बडे खतरे का सामना करेंगे ।
वैश्िक ध्ुिीकरण का सबसे मनणाथा्यक प्रभाव भारत के दलित समुदा्य पर पडेगा । जैसे-जैसे पश्चमी और गैर-मुस्लम गुट कमजोर होगा, दलितों के ईसाई धमाांतरण के पीछे काम करने वाली विदेशी मशीनरी भी धि्त हो जाएगी । इस संकट की घडी में, दलित समाज उन ताकतों को पूरी तरह खारिज कर देगा जो उ्हें अपनी जडों से अलग करना चाहती हैं । दलित समाज भारत राषट्र और इसकी प्राचीन हिंदू संस्कृति के साथ मजबूती से खडा होगा । ्यह बदलाव ' भीम-मीम '( दलित-मुस्लम गठबंधन) के कृत्रिम नैरेटिव का भी अंत कर देगा, क्योंकि दलित ्यह समझ जाएंगे कि उनका सममान और सुरक्ा भारत की अपनी मूल सभ्यता के जीवित रहने में ही निहित है ।
एक धार्मिक ध्ुिीककृत दुमन्या में, दलित समाज भारत के साथ पूर्ण एकजुटता में खडा होगा और धमाांतरण की कोशिशों को सिरे से नकार देगा । जब वि्ि कानून के ्रान पर धर्म को अपना आधार बना लेगी, तो हाशिए पर रहने वाले समाज की एकमात् सुरक्ा उनके अपने पूर्वजों की भूमि की एकता और शशकत में होगी । �
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