March 2026_DA | Page 35

इसका कोई निश्चत मन्यम नहीं होता है बशलक इसे इस प्रकार से गा्या जाता है कि जनमानस के होठों पर सजकर, आतमा में बस जाए । मैथिली लोक गीतों में ज्यादातर देवी देवताओं, पर्व त्योहारों, प्रककृमत विशेष, पौराणिक चरित्ों को जैसे बाबा विद्ापति, आचा्यथा सुमन, स्ेहलता, बाबा लक्मीनाथ गोसाई, काशीनाथ झा मधूप, के साथ मन की सारी भावनाओं आदि की व्याख्या होती है । कई ऐसे गीत होते जो जनमानस की जुबान पर बसे होते हैं लेकिन लेखक का नाम किसी को पता नही होता है । इसके द्ारा जीवन में बीत
रहे हर एक पल को भी दशाथा्या जाता है जैसे, प्रेम गीत, विवाह गीत, विरह गीत, ककृमष प्रधान गीत इत्यादि ।
लोकगमीरों का बहुआयाममी प्रभाव
मैथिली लोकगीतों में विमभन् प्रकार के वाद् ्यंत् जैसे ढोल, बांसुरी, झांझर, हारमोमन्यम, तबला का प्र्योग मक्या जाता है । ्यह पूर्णतः जनमानस का गीत है, इसके ्िर ल्य ताल पारंपरिक होते हैं, इसे गाते हुए आध्याशतमक और सामाजिक प्रथाओं का ज्ान और अपनेपन का एहसास होता है । ्यह जनमानस के ह्रद्य पटल पर सहज और सुलभ रेखांकित हो जाता है । मैथिली लोक संगीत का मुख्य उद्े््य जनमानस का मनोरंजन ही नहीं बशलक हर एक अवसर पर उललास, उमंग, करुणा, सुख-दुख की कहानी को मचमत्त करना है । संगीत का प्रभाव तो वि्िव्यापी है जिसे सब ने देखा है कि संगीत के लहर पर कैसे विषधर भी सपेरे के वश में
हो जाते हैं । इसी प्रकार लोकगीत इंसान के मानसिक स्रमत को ्ि्र बनाने में पूर्ण ्योगदान देती है । अब तो अ्पतालों में भी ्यह प्रमाणित कर मद्या ग्या है कि गीत संगीत से असाध्य रोगों में भी फर्क आने लगा है l लोकगीतों के द्ारा श्मिकों का की का्यथा क्मता भी बढ़ाई जा सकती है, कल कारखानों में टिफिन के छुट्टी के सम्य अकसर लोकगीत सुनकर ही अपना सम्य बिताते हैं और थकान दूर करते हैं । लोकगीत से मचत् को बहुत ही शांति मिलती है । मैथिली लोक गीतों में जनमानस के हृद्य की भावना इस तरह से उभर कर आती है कि विरह वेदना और खुशी के पल नजर के सामने घूमने लगते हैं, ऐसा लगता है की इंसान प्रत्यक् गीतों को अपने जीवन में जी रहा हो ।
लोकगमीरों में अपनापन का जुडाव
इसमें सामाजिक कोई भी दूरर्यां नहीं रह जाती हैं और लोग एक दूसरे से संगीत के माध्यम से जुड जाते हैं । इस तरह हम कह सकते हैं कि लोकगीत बहुत ही शशकतशाली है और सभी भावनातमक समस्याओं के लिए सकारातमक संदेश पहुंचाती है । इसमें कोई किसी से कुछ नहीं पूछता और इसके माध्यम से सब कुछ कह जाता है । हृद्य के माधु्यथा को का्यम रखते हुए सभी नकारातमक विचारों को हटाकर मनुष्य की एकाग्रता की शशकत को जागृत करता है । इस विधा से सबसे मप्र्य व्यशकत के साथ बिताए गए सभी ्यादों को पुनः प्रत्यक् अनुभव मक्या जा सकता है । इसकी कोई सीमा बाधा और मन्यम मनदचेमशका नहीं है ्यह केवल लगन है, श्द्धा है जिसे सुनकर महसूस ही मक्या जा सकता है और भावविभोर हुआ जा सकता है । वा्ति में मैथिली लोकगीत तो दैविक वरदान जैसा है तो सामाजिक मचत्ण और भावाभिव्यशकत का सशकत माध्यम होने के साथ ही आध्याशतमक चेतना, सांस्कृतिक समृद्धि एवं सत— चित— आनंद का संदेश देता है । वैसे भी मैथिली बहुत ही मधुर भाषा है और इसके लोकगीतों का असीमित, सनातन से प्रवाहित और ्पंमदत बहुआ्यामी वि्तार आतमा और परमातमा के बीच की कडी से कम नहीं है । ्यह समाज में
्योग की तरह है जो इंसान के हामयोन संतुलन को बनाए रखता है । इसके साथ ही शरीर व मस्तषक को आराम व प्रफुललता देने का का्यथा भी करता है ।
परिवर्तन को समेटना परम्परा की विशेषता
कभी-कभी बदलते परिवेश को देखकर कुछ लोग विचलित हो जाते हैं । उ्हें कुछ क्ण के लिए ऐसी संभावनाएँ दिखाई देने लगती हैं कि फिलमी गीत के ्युग में और गाँव से शहरों में पला्यन के रफतार में कहीं लोकगीत समापत न हो जाए लेकिन ऐसी बात नहीं है । परमपरा तो परमपरा है । परमपरा प्रत्येक काल मे जीवित रहती है । परिवर्तन को समेट लेना परमपरा की विशेषता है लोक गीतों की परमपरा को समझने वके लिए भागवत गीता का वह क्थ्य जब अर् जुन भगवान ककृषण से पूछते है कि हे प्रभो ्ये भागवत गीता का क्थ्य जो आप मुझे समझा रहे हैं वह क्या है? भगवान ककृषण इस पर बहुत ही सहजभाव से अपने सखा एवं भकत अर् जुन को समझाते हैं: हे अर् जुन! ्यह ्योग का विधान अर्थात भागवत् गीता सर्वप्रथम सू्यथादेव को बतला्या ग्या भगवान सू्यथादेव ने इसे मनु को बता्या, मनु ने पुन: इक्िाकू को समझा्या, और इस तरह एक के बाद दूसरे द्ारा एक वकता से दूसरे वकता में ्यह आता रहा । मक्तु सम्य के चलते प्रवाह में ्यह आता रहा । मक्तु सम्य के चलते प्रवाह में ्यह कहीं कुछ क्ण के लिए खो ग्या और इस तरह से श्ीककृषण को एक बार पुन: कुरुक्ेत् के मैदान में अर् जुन से इस ्योग को कहना पड़ा । मैथिली लोग गीतों की अि्रा भी ्यही है । लोक गीतों का चररत् ही ऐसा होता है कि इसे कोई चाहकर भी समापत नहीं कर सकता । इतिहास के पन्ों पर काइ्याँ पुत जाएँगी, ्युग-्युग के सं्कार धुल जाएँगे और तकदीर की लिपि भी मिट जाएगी लेकिन लोक-हृद्य की संवेदनशील वाणी ्युग-्युग तक अमर रहेगी । आज मिथिला के तमाम बुद्धिजीवि्यों एवं सामान्य नर-नारी को इसके बारे में विचार करना है । और परमपरा को जीवित रखना है । वैसे परमपरा अभी भी अक्ुणण है । �
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