March 2026_DA | Seite 15

राज्यों में रहने वाली गरीब, दलित और वंचित जनता भाजपा की सरकार का गठन करने के लिए सबसे आगे नजर आ रही है ।
दश्लर राजनमीति और विकास
भारत में दलित वर्ग को राजनीति से जोडने का श्रेय डा. भीम राव आंबेडकर को जाता है । अपने पूरे जीवन में डा. आंबेडकर ने दलित वर्ग के सर्वकल्याण की जो कलपना की थी, उस पर का्यथा करते रहे । परिणाम दलितों की स्थितियों में प्रारमभ हुए सुखद बदलाव के रूप में सभी ने देखा । दलित जनसंख्या भारत की कुल जनसंख्या का लगभग एक चौथाई मह्सा है । इतनी बडी जनसंख्या की राजनीति की देश की राजनीति में प्रमुख भूमिका होनी चाहिए पर्तु वा्ति में ऐसा है नहीं । वर्तमान में दलितों के नाम पर समक्र्य अधिकांश राजनीतिक दलों की राजनीति व्यशकतिादी, जातिवादी, अवसरवादी, मसद्धा्तहीन, मुद्ामिहीन और अधिना्यकवादी है । इनके नेता डा. आंबेडकर और दलितों के नाम पर व्यशकतगत
लाभ के लिए अलग अलग पामट्ट्यों के से गठजोड करते रहते हैं । इसी राजनीति के फल्िरूप आज दलित वर्ग कई तरह की कमजोरर्यों का शिकार हो चुका है और दलित वर्ग राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में न होकर हामश्ये पर है । कई दशकों से कथित कल्याण के नाम पर दलित नेता दलितों का भावनातमक शोषण करके उनका अपने लाभ के लिए इ्तेमाल कर रहे हैं । परिणाम्िरूप दलित सिर्फ इन दलित नेताओं और दूसरी पामट्ट्यों के लिए वोट बैंक बन कर रह गए और दलित वर्ग से जुडे मूल मुद्े, गरीबी, भूमिहीनता, बेरोजगारी, अशिक्ा, उतपीडन और सामाजिक तिर्कार कही पीछे छूट गए हैं । वर्तमान दलित राजनीति अपने जनक डलॉ. आंबेडकर की विचारधारा, आदशयों और लक््यों से पूरी तरह भटक चुकी है ।
वर्तमान दलित राजनीति मसद्धा्तहीन एवं अवसरवादी गठजोड का शिकार है । वर्तमान दलित राजनीति की जो कमम्यां, कमजोरर्यां, भटकाव और उलझनें दृशषटगोचर हुई हैं उनके
परिपेक््य में एक नए विकलप की जरुरत है जो परमपरागत सत्ा की राजनीति की जगह व्यि्रा परिवर्तन की पक्धर हो । डा. आंबेडकर द्ारा ्रामपत पामट्ट्यों की एक खास विशेषता ्यह थी कि इनमें सामूहिक नेतृत्ि और अंदरूनी लोकतंत् का विशेष प्रावधान था । व्यशकत पूजा के लिए कोई ्रान नहीं था । बाबा साहब ने कहा था कि जातिविहीन एवं वर्गविहीन समाज की ्रापना हमारा राष्ट्रीय लक््य है । वर्तमान दलित पामट्ट्यां दलितों को मशमक्त करने, उद्ेमलत करने और संगठित करने की ्रान पर उनका इ्तेमाल केवल जाति वोट बैंक के रूप में करती हैं । इसी तरह वर्तमान दलित नेताओं का कद और बुद्धिमत्ा डा. आंबेडकर के मापदंडों से कोसों दूर हैं । अतः दलित पाटजी की राजनीतिक और सामाजिक भूमिका बहुत ्पषट होनी चाहिए और उन के नेता सु्योग्य होने चाहिए । इस दिशा में भाजपा लगातार काम कर रही है, जिसका परिणाम दलित समाज में भाजपा के प्रति बढ़ते मोह के रूप में देखा जा सकता है । �
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