Legacy India-June 2021 | Page 50

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एलोपैथी बनाम आयुववेद

लोपैथी और आयुववेद को लेकर पिछले कु छ दिनों से देश में जंग छिड़ी हुई है । आईएमए और बाबा रामदेव की आपसी बयानबाजी से कोविड की वर्तमान पररपस्पतयों में आम आदमी पर कया प्रभाव पड़ रहा होगा इस विषय में सोचे बिना दोनों में विवाद जारी है ।

ऐसे दौर में जब हमारा देश ही नहीं बपलक समपूणमा पवश् ही बेहद जटिल एवं संवेदनशील पररपस्पतयों से गुजर रहा है , उस समय चिकितसा विज्ान की दो पद्धतियों का खुद को बेहतर बताने की होड़ में एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए आरोप प्रतयारोप का यह घटनारिर वाकई में दुर्भागयपूर्ण है ।
दोनों ही चिकितसा पद्धतियाँ मानव जीवन के कलयाण के लिए आपसततव में आई ंहैं । एक कल का विज्ान है तो एक आज का । लेकिन इसके साथ साथ दोनों की ही अपनी सीमाएं भी हैं । ऐलोपैथी की बात करें तो उसकी सबसे बड़ी कमी यह है कि वो रोग का इलाज करती है रोगी का नहीं । वो लक्णों का इलाज करती है बीमारी का नहीं । जबकि आयुववेद में रोग का नहीं रोगी का इलाज किया जाता है और लक्णों के आधार पर बीमारी की जड़ का पता लगाकर उसका इलाज किया जाता है ।
यह समझना आवशयक है कि चिकितसा विज्ान चाहे जो भी हो उसका एकमात्र लक्य मानव जाति का कलयाण है और चिकितसक का कर्तवय रोगी को रोग की पीड़ा से मुक्त करना । तो समय के साथ आगे बढ़कर दोनों पद्धतियां अपनी अपनी कमियों को सवीकार करें और एक दूसरे की शक्तियों को अपनाकर मानव जाति के कलयाण का मार्ग प्रशसत करें । यदि ऐसा हुआ तो एक बार फिर भारत का चिकितसा जगत पवश् के लिए पथप्रदर्शक बन सकता है ।
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