July 2026_DA | Page 35

दर्शन अपने आप में सामाजिक संगठन का कारक और कारण, दोनों है ।
सामाजिक समरसता दर्शन करी अ्वधारणा एक भेदभा्वमु्त समाज करी निर्मात्री है । सामाजिक ल्वरमता, कृत्रिम भेदभा्वपूर्ण जातरीरता, रंगभेद अथ्वा प्रजाति भेद और आर्थिक भेदभा्व पर आधारित दूषित मानसिकता ए्वं अनैतिकतायु्त व्यवहार करी समाकपत हेतु संसार में सामाजिक समरसता दर्शन करी अ्वधारणा एक अचूक औषधि है । यह एक ऐसरी सामाजिक दशा है, जिसमें भेदभा्वरहित मान्व समाज एक साथ आचार-व्यवहार करता हुआ िरी्वनयापन करता है और उसमें किसरी भरी प्रकार करी आपस में दरी्वार नहीं होतरी है । मान्व समाज के सभरी वर्गों करी आपस में एकता ए्वं समबद्धता को सथालपत करके उनको सुख-शाकनत प्रदान करने में सहायक होने के कारण सामाजिक समरसता करी अ्वधारणा में किसरी भरी प्रकार करी ल्वरमता के लक्षण नहीं पाए जाते हैं । मान्व
समाज के संयु्त परर्वार, जो आज आर्थिक भेद पर आधारित सतररीकरण के कारण दूषित हुआ, उसे सुधारकर पुनर्जीवित करने हेतु सामाजिक समरसता सुख-समृद्धि, शाकनत ए्वं कलरार करी एक परिणति है ।
धार्मिक आधार पर सामाजिक समरसता को धर्माद्रित करते हुए भारतरीर समाजशाकसत्रों ने कहा है कि पुरुषार्थ का प्रथम साधन‘ धर्म’ समाज से अलग नहीं है, इसलिए‘ धार्मिक मान्व समाज’ कहा जाए अथ्वा‘ सामाजिक धर्म’ कहा जाए, सामाजिक समरसता दोनों हरी सनदभ्य से जुडरी हुई है । संसार में सामाजिक समरसता धर्म को स्व्यग्ाह्य बनाने करी मरीठरी ल्टलकरा है । धर्म के सभरी दसों लक्षण सामाजिक समरसता से अभिपूर्ण होने पर हरी मर्यादित होते हैं । आश्म- धर्म करी ररीढ़ सामाजिक समरसता है । यह लोगों को धर्माेनमुख बनाए रखने करी एक सक्षम प्रेरणा है ।
सामाजिक समरसता का अभिप्राय
आधराकतमक दर्शन से भरी जुड़ा हुआ है । यह मूल्यवान दार्शनिक शासत् करी कडरी है । भारतरीर दर्शन पर आधारित सामाजिक समरसता एक सामानर प्राककृलतक प्रलकरा है । यह मन, आदर्श, सहृदयता से समबकनधत भा्वनातमक अभिवरक्त अथ्वा प्रलकरा है, जिसे संसार में अ्वतार्वाद का कारण भरी माना जाता है । दार्शनिक चिनतन के परिप्रेक्र में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सामाजिक नियमों ए्वं मानदणडों के प्राककृलतक स्वरूप को बनाए रखने तथा मान्व समाज में समरसता को सुदृढ़ करने के उद्ेशर से हरी समय-समय पर भारतरीर ए्वं अनरानर समाजों में ईश्वररीर तत्वों को धारण करने ्वाले साधकों का जनम हुआ है, और उनके प्रतिपादित नियम भरी सा्व्यभौमिक होते हुए समरसतापूर्ण रहे हैं । भारतरीर दर्शन इसरी को उदरोलरत करते हुए कहता है कि लोगों के व्यवहार यदि आपस में समरसतापूर्ण रहे तो भाईचारा ए्वं बनधुत्व का भा्व उतपन्न होगा । �
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