जनकृ ति अंिरराष्ट्रीय पतिका / Jankriti International Magazine( बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर की 125वीं जयंिी पर समतपिि अंक)
ISSN 2454-2725
-संजय वर्मष
आददवासी बाहुल्य क्षेत्रो मे भगोररया पवव आते ही वासदततक छटा मन को मोह लेती है वही इस पवव की पूवव तैयारी करने से ढोल, बाांसुरी की धुनों की दमठास कानों मे दमश्री घोल देती है व उमांगो में एक नई ऊजाव भरती है | व्यापारी अपने-अपने तरीके से खाने की चीजे गुड की जलेबी, भदजये, खाररये( सेव) पान, कु ल्फी, के ले, ताड़ी बेचते साथ ही, झूले वाले, गोदना( टैटू) वाले अपने व्यवसाय करने मे जुट जाते है | दजप, छोटे ट्रक, दुपदहया वाहन, बैलगाडी पर दूरस्थ
गााँव के रहने वाले समीप भरे जाने वाले हाट( दवशेष कर पूवव से दनधावररत लगने वाले भगोररया) मे सज-धज के जाते है | कई नोजवान युवक-युवदतया झु ांड बनाकर पैदल भी जाते है | ताड़ी के पेड़ पर लटकी मटदकया दजस मे ताड़ी एकदत्रत की जाती है बेहद खुबसूरत नजर आती है | खजूर, आम आदद के हरे भरे पेड़ ऐसे लगते है मानों ये भगोररया मे जाने वालो का अदभवादन कर रहे हो, फागुन माह में आम के वृक्षों पर नए मोर और पहाड़ो पर दखले टेसू का ऐसा सुतदर नजारा होता है मानों प्रकृ दत ने अपना अनमोल खजाना खोल ददया हो ।
भगोररया पवव का बड़े-बूढे सभीआनद लेते है | भगोररया हाट मे प्रशासन व्यवस्था भी रहती है | हाट मे जगह- जगह भगोररया नृत्य मे ढोल की थाप से धुन- " दधचाांग पोई पोई.." जैसी ध्वदन सुनाई देती और बाांसुरी, घु ांघरुओां की ध्वदनया दृश्य मे एक चुम्बकीय माहौल पैदा करती है | बड़ा ढोल दवशेष रूप से तैयार दकया जाता है दजसमे एक तरफ आटा लगाया जाता है | ढोल वजन मे काफी भारी और बड़ा होता है, दजसे इसे बजाने मे महारत हादसल हो वो ही नृत्य घेरे के मध्य मे खड़ा हो कर इसे बजाता है | एक रांग की वेश भूषा, चाांदी के नख से दशख तक पहने जाने वाले आभूषण, घु ांघरू पावों मे हाथों मे रांगीन रुमाल दलए गोल घेरा बनाकर माांदल व ढोल, बााँसुरी की धुन पर बेहद सुतदर नृत्य करते है |, प्रकृ दत, सांस्कृ दत, उमांग, उत्साह से भरा नृत्य का दमश्रण भगोररया की गररमा मे वासदततक छटा का ऐसा रांग भरता है की देश ही नहीं अदपतु दवदेशों से भी इस पवव को देखने दवदेशी लोग कई क्षेत्रों में आते है इनके रहने और ठहरने के दलए प्रशासन द्वारा के म्प की व्यवस्था भी की जाने लगी है लोक सांस्कृ दत के पारम्पररक लोक गीतों को जैसे-" काली दचड़ी तू बड़ी मतवाली छे " आदद अनेक लोक गीतों को गाया जाकर माहोल मे एक लोक सांस्कृ दत का बेहतर वातावरण दनखरता साथ ही प्रकृ दत और सांस्कृ दत का सांगम हरे-भरे पेड़ो से दनखर जाता है | कई क्षेत्रों में जांगलो के
कम होने से व गावों के दवस्तृत होने से कई क्षेत्रो मे कम्पौंड के अतदर ही नृत्य करवाया जाकर भगोररया पवव मनाया जाने लगा है । भगोररया नृत्य टीम को सम्मादनत दकया जाता है । देहली में राष्ट्ट्रीय पवव पर भगोररया पवव की झाांकी भी दनकली जाती है । भगोररया पवव पर उपयुक्त स्थान मे व्यापाररयों द्वारा ज्यादा से ज्यादा सांख्या मे खाने पीने की चीजो की दुकान लगाना, छााँव की बेहतर व्यवस्था, पीने के पानी की सुदवधा, झूले आदद की अदनवायवता होनी चादहए तादक मनोरजन के साथ लोक सांस्कृ दत का आनांद सभी ले सके | झाबुआ / आलीराजपुर / धार / खरगोन, आदद दजलों के गाांवों के भगोररया पवव लोक गीतों एवम नृत्य से अपनी लोक सांस्कृ दत को दवलुप्त होने से बचाते आरहे है । इसका हमें गवव है ।
संजय वर्मष " दृष्टि " १२५, शहीद भगत ष्टसंग र्मगष र्नमवर( धमर) र् प्र 454446
Vol. 2, issue 14, April 2016. व ष 2, अंक 14, अप्रैल 2016.