Jankriti International Magazine Jankriti Issue 27-29, july-spetember 2017 | Page 424

Jankriti International Magazine / जनकृ सत अंतरराष्ट्रीय पसिका ISSN: 2454-2725
अंतरराष्ट्रीय स्पंदन कथा सम्मान( २०१४)[ 20 ]
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तोर्षी अमृता मिटेन मे बसी भारतीय मूल की महंदी लेखक है । तोर्षी अमृता शृ ंगार रस की कवमयत्री हैं । उनके गीतों में प्रेम एवं शृ ंगार मुखर रूप से मदखाई देते हैं । उनकी भार्षा सरल, पठनीय एवं सुरीली होती है । वैसे उन्होंने कु छ छु टपुट कहामनयां भी मलखी हैं लेमकन मूलत: वे गीतकार हैं और महन्दी सामहत्य को कु छ सुन्दर से प्रेमगीत देने की तैयारी में हैं ।
१३)
मदव्या माथुर मिटेन मे बसी भारतीय मूल की महंदी लेखक है । कमवता और कहानी समान रूप से मलखती रही हैं । उनके कहानी संग्रह `आक्रोश ' के मलए उन्हें वर्षा 2001 का पद्मानंद सामहत्य सम्मान प्राप्त हो चुका है । उनकी कमवताओं में जहां तीखा क्षोभ है, वहीं माममाकता भी है, संवेदनशील बुनावट है तो भावात्मक कसावट भी है । उनके कहानी संग्रह में संग्रमहत अमधकतर ररश्तों और मस्थमतयों में मपस रही औरत की कहामनयां हैं । उनके रचना संसार में सास और पमत आमतौर पर ज़ुल्म का प्रतीक बनकर उभरते हैं । उनकी कहामनयों का अनुवाद कई भार्षाओंमें हुआ है । उनकी कहामनयों एवं कमवताओं को भी कई संकलनों में शाममल मकया गया है । उनके अब तक चार कमवता संग्रह प्रकामशत हो चुके हैं । भारत में उनके रचना संसार पर एम. मफल. भी की जा चुकी है । सामहत्य रचने के अमतररक्त मदव्या माथुर `वातायन ' संस्था की अध्यक्षा, `यू ॰ के ॰ महन्दी समममत ' की उपाध्यक्षा एवं `नेहरू के न्द्र ' की कायाक्रम अमधकारी हैं ।
देश-मवदेश के बीच आवागमन करती कहामनयां मदव्या माथुर प्रवासी महंदी लेखन की प्रमतमनमध रचनाकार हैं । मैमथलीशरि गुप्त प्रवासी लेखन सम्मान से सम्मामनत मदव्या जी की सामहमत्यक प्रमतभा गद्य और पद्य दोनों मवधाओंमें समानांतर रूप से गमतशील है । मदव्या जी 1984 में भारतीय उच्चायोग से जुड़ी और 1992 से नेहरु कें द्र में वररष्ठ कायाक्रम अमधकारी के पद पर कायारत हैं । लंदन में बसे प्रवासी भारतीय लेखकों के बीच मदव्या जी अह्म स्थान रखती हैं । उनके सद्य प्रकामशत कहानी संग्रह‘ 2050 तथा अन्य कहामनयां’ में संकमलत कहामनयां देश और मवदेश के बीच के पररवेश को सामने लाती हैं । इन कहामनयों का कथ्य भारत तथा लंदन दोनों देशों से जुड़कर बनता है । प्रवासी जीवन सुखद और आकर्षाक लगता है । परंतु इन कहामनयों में प्रवासी जीवन की जो मवड़म्बनायें मचमत्रत हुई हैं, वे मवदेश के प्रमत हमारे मोह को तोड़ती हैं और स्वदेश से जोड़ती हैं । अथाकें द्रीत पाररवाररक तथा सामामजक संरचना की जकड़न में संवेदनाओं और भावनाओं का दम घुटने लगता है तो हमें देश और मवदेश का फका साफ-साफ मदखाई देता है । यह फका मदव्या जी की कहामनयों में प्रमुखता से उद्घामटत हुआ है । ये कहामनयां इस ममथक को भी तोड़ती हैं मक सेक्सुअल इंमडपेडेंसी सेक्स अपराध को रोकती है ।‘ वैलेन्टाइन्स डे’ और‘ नीली डायरी’ जैसी कहामनयां इस संदभा में उल्लेखनीय हैं ।‘ मफक्र’ में अपनी दूसरी मां के प्रमत बेटी की घृिा प्रकट हुई है ।‘ पुरु और प्राची’ कहानी बाजारवादी शमक्तयों द्वारा मनुष्ट्य को गुलाम बनाये जाने को रेखांमकत करती है । झूठी प्रमतष्ठा और शान के मलए अपना सब कु छ दांव पर लगा देने वाले बद्रीनारायि ओसवाल और उसके पुत्र-पुत्रवधू चंद्रमा की यात्रा पर चले तो जाते हैं परंतु इस यात्रा में मसवाय खीझ और दुख के उन्हें कु छ नहीं ममलता ।
Vol. 3, issue 27-29, July-September 2017. वर्ष 3, अंक 27-29 जुलाई-सितंबर 2017