Jankriti International Magazine / जनकृ सत अंतरराष्ट्रीय पसिका ISSN: 2454-2725
हुई थी, हालाँमक ऊपर-ऊपर से मुझे इसके बारे में कु छ भी नहीं पता था । और जब मुझे इसकी ज़रूरत महसूस हुई तो यह अचानक मेरी स्मृमत में पूरी मशद्दत से उठ खड़ी हुई ।
मुझे उस बेचारे गुलाम कृ र्षक के चेहरे पर मौजूद माँ-जैसी मृदु मुस्कान याद आई, और यह भी याद आया मक कै से उसने अपनी उँगमलयों से मुझ पर ईसाई धमा के क्रॉस का मचह्न बनाया तामक मैं हर मुसीबत से बचा रहूँ । मुझे उसका यह कहना भी याद आया, " अरे, तुम तो बेहद डर गए हो । मेरे प्यारे बच्चे, सब ठीक होगा । " और मुझे मवशेर्ष रूप से ममट्टी लगी उसकी उँगमलयाँ याद आई ंमजनसे उसने संकोचपूिा कोमलता से भर कर मेरे फड़फड़ाते होठों को धीरे से छु आ था । यमद मैं उसका अपना बेटा रहा होता तो भी वह इससे अमधक स्नेह-भरी चमकती आँखों से मुझे नहीं देखता । और मकस चीज़ ने उसे ऐसा बना मदया था? वह तो हमारा गुलाम कृ र्षक था और कहने के मलए मैं उसका छोटा मामलक था । वह मेरे प्रमत दयालु था, इस बात का पता न मकसी को चलना था, न ही कोई उसे इसके मलए इनाम देने वाला था । क्या शायद छोटे बच्चों से उसे बहुत प्यार था? कु छ लोगों का स्वभाव ऐसा होता है । वीरान खेत में यह मुझसे उसकी अके ली मुलाकात थी । शायद यह के वल ईश्वर ने ही ऊपर से देखा होगा मक एक रूसी गुलाम कृ र्षक का हृदय मकतने गहरे, मानवीय और सभ्य भावों से और मकतनी कोमल, लगभग मस्त्रयोमचत मृदुता से भरा था । यह वह गुलाम मकसान था मजसे अपनी आज़ादी का न कोई ख़्याल था, न उसकी कोई उम्मीद थी । क्या यही वह चीज़ नहीं थी जब कौंस्टैंमटन अक्साकोव ने हमारे देश के कृ र्षकों में मौजूद उच्च कोमट की मशसेता और सभ्यता की बात की थी?
और जब मैं अपने मबस्तर से उतरा और मैंने अपने चारो ओर देखा तो मुझे याद है, मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे मैं इन दुखी ग़ुलामों को मबल्कु ल अलग मकस्म की मनगाहों से देख सकता हूँ । जैसे अचानक मकसी चमत्कार की वजह से मेरे भीतर मौजूद सारी घृिा और क्रोध पूरी तरह ग़ायब हो गए थे । चलते हुए मैं ममलने वाले लोगों के चेहरे देखता रहा । वह मकसान मजसने दाढ़ी बना रखी है, मजसके चेहरे पर अपराधी होने का मनशान दाग मदया गया है, जो नशे में धुत्त कका श आवाज़ में गाना गा रहा है, वह वही मारेय हो सकता है । मैं उसके हृदय में झाँक कर नहीं देख सकता ।
उस शाम मैं एम. से दोबारा ममला । बेचारा! उसकी स्मृमतयों और उसके मवचारों में रूसी मकसानों के प्रमत के वल यही भाव था-- " सब के सब डाकू-बदमाश हैं । " हाँ, पोलैंड के बंमदयों को मुझसे कहीं ज़्यादा कटुता का बोझ उठाना पड़ रहा था ।
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Vol. 3, issue 27-29, July-September 2017. वर्ष 3, अंक 27-29 जुलाई-सितंबर 2017