Jankriti International Magazine / जनकृ सत अंतरराष्ट्रीय पसिका ISSN: 2454-2725
रहता है ।” 77 एक आलोचक के रूप में अनुवादक को भी यह मजम्मेदारी उठानी होती है उसे अपने अनुवाद- कमा में नई व्याख्याएं देनी होती है । एक रचनाकार के रूप में उसी सृजन-पीड़ा से होकर गुजरना होता है और एक नई कृ मत को जन्म देना होता है । मफर अनुवादक तथा अनुमदत कृ मत की अपनी स्वतंत्र सत्ता क्यों न हो? इस संदभा में“ याकोलिन ने सृजनात्मक पाठ के अनुवाद को मूल पाठ का प्रमतरूप न मानकर सृजनात्मक रूपातंरि कहां है । यह एक ऐसी स्वायत सृजानात्मक मवधा है मजसकी अपनी सत्ता है ।” 78
प्रेमचंद की कहानी‘ ितरंज के सखलाड़ी’ का िययजीत राय द्वारा मकया गया मफ़ल्मी रूपातंरि( मसनेमेमटक रांसलेशन) अच्छा उदाहरि है । जहां सत्यमजत राय कहानी की मूल संवेदना को संजीदगी के साथ पकड़ते है मक मकस प्रकार उस दौर का राजनीमतक पतन हो चुका था, वही नई व्याख्याएं भी देते हैं । प्रेमचंद के यहां वामजदअली शाह को एक पतनशील राजा के रूप में मचमत्रत मकया गया है । जोमक एक औपमनवेमशक समझदारी है । वहीं सत्यजीत राय के यहां वह“ स्वभाव से कमव, मवद्वान और सुसंस्कृ त
व्यमक्त तो है ही, सौंदया का पारखी भी है । उसे समझने में देर नहीं लगती मक डूबते मुगमलया राज की तमाम मवकृ मतयों को दूर करने के मलए वह पैदा नहीं हुआ है । ये मवकृ मतयां कोई एक मदन में पैदा नहीं हुई हैं, अमपतु कई-कई दशकों या पूरी एक शताब्दी में पैदा हुई है ।” 79 सत्यजीत राय के यहां वामजदअली शाह का पूरा चररत्र शासक-वगा द्वारा गढ़े गए एक शासक के मदावादी चररत्र को बार-बार चुनौती देता है ।
मीर साहब की बेग़म मजस“ अज्ञात कारि” 80 से मीर साहब को घर से दूर रखना उपयुक्त समझती थी, सत्यजीत राय उस‘ अज्ञात कारि’ का भेद खोल देते हैं मक महल के अंदर बेग़मों की जो उपेमक्षत अतृप्त इच्छाएं थी, वह मकस प्रकार अलग-अलग माध्यमों से पूरी होती हैं ।
प्रेमचंद के यहां, जहां“ अपने बादशाह के मलए मजनकी आंखों से एक बू ंद आंसू न मनकला, उन्हीं दोनों प्रामियों ने शतरंज के वजीर की रक्षा में प्राि दे मदए ।” 81 वहीं सत्यजीत राय के यहां“ अंत में, जब अंग्रेज लखनऊ में प्रवेश कर जाते हैं तब भी वह
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संकलन, गोपेश्वर ससंह,‘ नसलन ववलोचन शमाच: संकसलत तनबंध’, प्रकाशन-नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडडया, नई ददल्ली, 2011, पृ. सं.- 62
78
कृ ष्ण कु मार गोस्वामी,‘ अनुवाद ववज्ञान की
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थचदानंद दास गुप्ता,‘ सत्यत्जत राय का ससनेमा’, नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडडया, नई ददल्ली, संस्करण-1997, पृ. सं.-77
80
सं.-भीष्म साहनी,‘ प्रेमचंद: प्रतततनथध कहातनयां’,
भूसमका’, पृ. सं.-274
राजकमल प्रकाशन, नई ददल्ली, 2010, पृ. सं.-74
81
वही, पृ. सं.-80
Vol. 3, issue 27-29, July-September 2017. वर्ष 3, अंक 27-29 जुलाई-सितंबर 2017