Jankriti International Magazine / जनकृ सत अंतरराष्ट्रीय पसिका ISSN: 2454-2725
काल-वातावरि से प्रभामवत होती है । लेखक अपने व्यमक्तगत तथा सामामजक जीवन के अनुभव, जो उसके अपने भी हो सकते है या मकसी और से सुने हुए भी हो सकते है, को सामहमत्यक भार्षा में पुनरुत्पामदत करता है ।‘ मूल-रचना’ भी मकसी घटना, अनुभव या मवचार का ही पुनसृ ाजन है । एक ऐमतहामसक प्रमक्रया का महस्सा है । उसी ऐमतहामसक प्रमक्रया का, मजसका महस्सा लेखक और अनुवादक दोनों है । मफर एक मौमलक और दूसरा गैर-मौमलक कै से हो सकता है? लुकाच इस संदभा में साफ-साफ कहते है मक“ मवश्व सामहत्य के सारे महान लेखक सहज भाव से या थोड़ा बहुत चेतन ढंग से, अपनी रचना में प्रमतमबंबन की मसद्धांत का अनुसरि करते रहे है और अपने कला मसद्धांतों को स्पसे करने में इस मसद्धांत का अनुसरि करते रहे है । सारे महान लेखकों का प्रमुख उद्देश्य यथाथा का कलात्मक पुनरुत्पादन रहा है... माक्सावादी सौन्दयाशास्त्र इस कें द्रीय प्रश्न का समाधान, मकसी बुमनयादी मौमलकता का दावा मकया बगैर, खोज लेता है ।” 71 लेमकन‘ यथाथा का कलात्मक पुनरुत्पादन’“ इंमद्रयजन्य तथ्यों का फोटोग्रामफक पुनराचना” 72 नहीं होनी चामहए । जो लोग यह मानते है मक मकसी
क्लामसक रचना का“ कला-उत्पादन एक ही बार संभव है ।” 73 लुकाच मानते हैं मक इस तरह की मवधाएं“ कलात्मक मवकास की मकसी कम मवकमसत मंमजल में ही संभव होती है ।” 74 मजसे मौमलक रचना कहा जा रहा है वह दरअसल‘ यथाथा का कलात्मक पुनरुत्थान’ है तो मफर ईमानदारी का यह बोझ अनुवादक के कं धे पर ही क्यों?‘ ईमानदारी’ का यह प्रश्न दरअसल नैमतक प्रश्न न होकर, एक राजनीमतक प्रश्न है । जो मक हमेशा‘ मूल पाठ’ को उच्चत्तर( Superior) और अनूमदत पाठ को मनम्नतर( Inferior) सामबत करना चाहता है ।
रामायि के 300 संस्करि अगल-अलग भार्षाओँमें उपलब्ध हैं । कहीं राम नायक है और कहीं रावि खलनायक तो कहीं रावि नायक है और राम खलनायक । कहीं राम-सीता को‘ आदशा दम्पमत’ के रूप में प्रस्तुत मकया गया है तथा कहीं राम – सीता – लक्ष्मि भाई – बहन है । कहीं सीता रावि की पुत्री है । अब मकसे‘ मूल पाठ’ कहा जाये और मकसे‘ ईमानदार’ न होने की वजह से खाररज कर मदया जाये? ये सारी कहामनयां अपने सांस्कृ मतक व ऐमतहामसक पररवेश में उपजी है । सबके अपने
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जॉजच लुकाच, लेख-सौंदयचशास्त्र के बारे में माक्सच
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वही, पृ. सं.-449
और एंगेल्स के ववचार, माक्सच-एंगेल्स,‘ सादहत्य और |
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वही, पृ. सं.-449 |
कला’, राहुल फाउं डेशन लखनऊ, प्रिम संस्करण-2006, |
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वही, पृ. सं.-457 |
पृ. सं.-456
Vol. 3, issue 27-29, July-September 2017. वर्ष 3, अंक 27-29 जुलाई-सितंबर 2017