Jankriti International Magazine/ जनकृसत अंतरराष्ट्रीय पसिका
ISSN: 2454-2725
रैनेत्ो पोसिओली ने अपने लेख ‘अन व ु ाद क्या सके ।’ उन्नीसवीं शताब्दी के अन व ु ाद-मचन्तक
है?’ में इस तथ्य को साफ-साफ मलखा है मक सर्िडजेराल्ड ने शामब्दक अन व ु ाद को ‘म ल
की
“अन व ु ाद के वल ‘Verandernde’ अथाात् शब्दों का आत्मा का हनन’ कहा है।
रूपांतरि न होकर भावों का रूपांतरि है।” 64
एक ही पाठ को अलग-अलग समय में कई
इस संदभा में ए ग ं ेल्ि, माक्िक को मलखी एक मचिी अन व ु ादकों ने अन व ु ाद मकया है जैसे मक ‘बाइमबल’
में कहते हैं मक “जहां कमठन अमभव्यमक्तयां ममलती हैं, का अन व ु ाद, ‘खैयाम की रुबाइयों’ का अन व ु ाद, या
वहां खाली जगह छोड़ देना बेहतर है, बजाय इसक मफर ‘अमभज्ञानशाक ं ु तलम ’ ् का अन व ु ाद। प्रत्येक
मक शामब्दक अन व ु ाद के बहाने ऐसी चीज मलखी जाए अन व ु ाद में पाठ को नए तरीके को समझने और
जो... सवाथा अथाहीन हो।” 65 प न ु सृामजत करने की कोमशश की गयी है। यहा
ड्राइडन ने सवाप्रथम अन व ु ाद के सैद्धांमतक पक्षों
पर मवचार मकया। “उन्होंने तीन प्रकार के अन व ु ादों की
चचाा की- (i) शब्दान व ु ाद (ii)भावान व ु ाद (iii)
अन क
रि” 66 मजसमें भावानुवाद को श्रेष्ठ माना है।
सििलर ने अपनी प स् ु तक ‘Essays On The
अन व ु ादक की भ म ू मका एक आलोचक की भी है। इस
संदभा डेसिड सिस्िल का कहना है मक “सामहमत्यक
काया में रूप और मवर्षयवस्तु दोनों पर ग भ ं ीर मवचार
की आवश्यकता होती है। मजससे एक ही पाठ के कई
अन व ु ाद सामने आ जाते हैं। ” 67
Principles of Translation’ में अन व ु ाद स ब ं ध ं ी सामहमत्यक अन व ु ाद के संदभा में मवचारकों न
महत्त्वप ि ू ा मवचार मदए है मक ‘अन व ु ाद को म ल
रचना अलग-अलग समय में अपने मवचार प्रस्त त ु मकये हैं ।
के साथ साधारिीकरि की अवस्था में जाना चामहए
लेमकन इन सभी मवचारकों में एक तारतम्य मदखाता
तामक म ल
रचना और अन म ु दत पाठ में भेद न पता चल
15
रै नेत्तो पोववओली, लेख-‘अनुवाद क्या है ’ , ‘अनुवाद-
बोध’, प . ृ सं.-23
माक्सच-एंगेल्स, ‘सादहत्य और कला’, राहुल
फाउं डेशन, लखनऊ, प्रिम संस्करण-2006, प . ृ सं.-114
65
66
“Literary work requires sensitive consideration of form
as well as content, and may prompt several translation , each
of which emphasizes a different aspect of the original.”
67
David Crystal, ‘The Cambridge Encyclopedia of
Language’, Pub. By-University of Cambridge, second
edition, pg. no.-346
डॉ. सुरेश ससंहल, ‘अनुवाद : संवेदना और
सरोकार’, संजय प्रकाशन, नई ददल्ली, प्रिम संस्करण-
2006, प . ृ सं.-3
Vol. 3 , issue 27-29, July-September 2017.
वर्ष 3, अंक 27-29 जुलाई-सित ब ं र 2017