Jankriti International Magazine / जनकृ सत अंतरराष्ट्रीय पसिका ISSN: 2454-2725
असभव्यसक्त में िामासजक पररितकन की महतड आकांक्षा सलए हुए है । दमलत मवमशा का उभार
सामामजक जड़ताओंपर प्रहार है । दूसरे शब्दों में कहा जाय तो यह एक नए िामासजक – आसथकक लोकतंि गढ़ने की िसदच्छा है । इस समदच्छा ने समकालीन महन्दी सामहत्य को एक नए आयाम से आवेमसेत मकया है, मवशेर्षकर कथा – सामहत्य को । यहाँ श्यौराज मसंह बेचैन का मनम्न कथन अवलोकनीय है –“ दमलत सामहत्य उन अछू तों का सामहत्य है मजन्हें सामामजक स्तर पर सम्मान नहीं ममला । सामामजक स्तर पर जामतभेद के जो लोग मशकार हुए हैं, उनकी छटपटाहट ही शब्दबद्ध होकर दमलत सामहत्य बन रही है ।” 1( बेचैन, डॉ. श्यौराज मसंह,- एक बेचैन रास्ता है दमलत कथा का –‘ अंगुत्तर’, जुलाई-अगस्त-मसतंबर, 1997, पृ. 70) समकालीन परर्टश्य में उभरा दमलत मवमशा मूलक सामहमत्यक स्वर अपने पूवावती स्वरों से मभन्न है । क्योंमक, यह के वल दमलत व्यथा, यातना और शोर्षि का उल्लेख भर नहीं करता, या मफर यह उसका गलदश्रु भावुकता पूिा मववरि देता है, बमल्क यह अपनी अपनी आत्मसजगता में समदयों से चली आ रही जामतवाद से कु ं मठत समाज – व्यवस्था का बमहष्ट्कार करता है । यहाँ इस संदभा में ओमप्रकाश वाल्मीमक के मनम्न कथन को पढ़ा जा सकता है –“ भारतीय समाज- व्यवस्था ने विा – व्यवस्था का एक ऐसा मजरहबख्तर पहन रखा है, मजस पर लगातार हमले होते रहे हैं मफर भी वह टूट नहीं पाई । बीसवीं सदी में सबसे बड़ा हमला अंबेडकर ने मकया … इस व्यवस्था को तोड़ने के मलए जामत – व्यवस्था का टूटना जरूरी है, तभी समाज में समरसता उत्पन्न हो सकती है ।” 2( वाल्मीमक, ओमप्रकाश, दमलत सामहत्य का सौंदयाशास्त्र, राधाकृ ष्ट्ि प्राइवेट, मलममटेड, प्र. सं 2001, पृ. 59-60) कहना न होगा मक
दसलत सिमिकमूलक िासहयय उन सिचारों, िंस्कारों, आचरणमूलक व्यिहारों िे मुसक्त की आकांक्षा रखने िाला िासहयय है, जो जासतिाद के हसथयार द्वारा पैने सकए गए हैं । सजिके कारण मानिीय असधकारों का हनन हुआ है और िमाज में ऊं च-नीच, श्रेष्ठ – हीन का भाि भरा गया है ।
मवमदत है मक महन्दी दमलत सामहत्य का प्रारमम्भक स्वर कमवता के रूप में था । कहामनयों का दौर बाद का है । महन्दी सामहत्य के समकालीन परर्टश्य अथाात् 1990 के आसपास दमलत मवमशा मूलक स्वरों के साथ महन्दी दमलत कहानी भी चच ा का मवर्षय बनती है । कहना न होगा मक समकालीन महन्दी कहामनयों में दमलत जीवन मस्थमतयों और चररत्रों के साथ जो सामामजक प्रश्न उभरता है, वह एक मवमशसे उद्देश्य को मलए हुए होता है । मजसे ओमप्रकाश वाल्मीमक के मनम्न कथन में लक्ष्य मकया जा सकता है-“ महन्दी दमलत कहानी का समकालीन परर्टश्य आठवें दशक में तेजी से उभरता है मजसमें कई नए रचनाकार उभरकर अपनी उपमस्थमत दज़ा करते हैं, और अपनी कहामनयों के द्वारा दमलत सामहत्य को एक मजबूत आधार देने की कोमशश करते हैं । दमलत कथाकारों का यह प्रयास जहाँ सजानात्मक आवेग से स्वयं को तलाशने की प्रमक्रया के साथ – साथ सामामजक पररवेश की गंभीर चुनौमतयों से टकराता है, वहीं महन्दी कहानी का पररचय उन मस्थमतयों और चररत्रों से कराता है मजनसे महन्दी रचनाकार अनमभज्ञ था ।” 3( वाल्मीमक, ओमप्रकाश, दमलत सामहत्य का सौंदयाशास्त्र, राधाकृ ष्ट्ि प्राइवेट मलममटेड, नई मदल्ली, प्र. सं. 2001, पृ. 108-109) ध्यान मदया जाय तो यहाँ ऐसी कई बातें उभरती हैं, जो दमलत मवमशा के नये स्वर से हमारा पररचय कराती हैं । पहली, समकालीन महन्दी कहानी में दमलत स्वर का उभार आठवें दशक में प्रारम्भ होता है । दूसरी, कहानी मवधा में दमलत स्वर
Vol. 3, issue 27-29, July-September 2017. वर्ष 3, अंक 27-29 जुलाई-सितंबर 2017