Jankriti International Magazine / जनकृ सत अंतरराष्ट्रीय पसिका ISSN: 2454-2725
जब रत्नसेन के आखेट से लौटकर‘ सुए’ की खोज करता है तो नागमती कहती है मक‘ वह सुआ शठ है, उसे मसर चढ़ाना अच्छा नहीं, क्योंमक जो आभरि कान को कसे दे, उसका प्रयोजन ही क्या । 6 यह सुनते ही रत्नसेन उसे प्रािदण्ड का आदेश देते हुए कहता है-
‘‘ कै परान घि आनहु मती । कै चसल होहु िुआ िंग िती ।
� * * जासन जानहु कै औगुन मंसदर होइ िुख िाज । आएिु मेसि कं ि कर काकर भा न अकाजा ।। 7
और तब नागमती का गवा चूर-चूर हो जाता है वह सोचती थी मक मैं पटरानी हूँ, मेरे पास अमधकार भी है, मेरा पमत मुझसे प्रेम करता है, मकन्तु अब उसे सब कु छ मनरथाक लगता है-
अैिें गरब न भूलै कोई । जेसह डर बहुत सपआरी िोई ।। 8
और वह अपनी धाय से कहती है-‘‘ मैंने अब तक अपने पसत की जो िेिा की, िह िब व्यथक गया, िेंमल के र्ल की आिा में उिका िेिन करने िाले िुए को भुआ समला ।’’ 9 इस गहरे मवर्षाद के बाद वह कहती है-‘‘ मैं सपय प्रीसत भरोिे गरब कीन्द्ह सजअ माँह । तेसह ररसि हौं परहेसलउँ सनगड़ रोि सकउन नाहँ । 10
यहाँ रोर्ष की बेड़ी में गहरी अमभव्यंजना है एक स्त्री की । जो अपने समस्त सुखों को पमत के अधीन समझती है, मकं तु वह सब के वल मात्र मदखावा प्रतीत होता है ।
धाय मक दूरदमर्षाता सुआ को बचा लेती है सुआ के कारि ही नागमती को रत्नसेन के वास्तमवक स्वरूप का ज्ञान होता है, वह कहती है-
िेिा करै जो बरहौ मािा । एतसनक औगुन करह सिनािा ।
जौ तुम्ह देइ नाि कै गीिा । छाँड़हु नसहं सबनु मारे जीिाँ ।। 11
वह कहती है मात्र इतने से अवगुि से तुम मुझे मार दोगे भले ही मैंने बारह मास तुम्हारी सेवा की । और यमद कोई गदान झुकाए तो तुम उसे मार डालोगे? यहाँ नागमती पूरे मध्ययुगीन मानमसक ढाँचे पर प्रहार करती है जो कृ पाभाव वाली है, भगवान, राजा, पमत सभी उसके‘ रक्षक’ सूचक शब्द है ।
नागमती पमत के परमेश्वर रूप को भी प्रष्ट्नांमकत करते हुए कहती है-
समलतासह मह जनु अहहु सननारे । तुम्ह िौं अहै अदेि सपयारे
मैं जाना तुम्ह मोंही माहाँ । देखौं तासक तौ हुह िब पाहाँ ।
का रानी का चेरी कोई । जा कहँ मया करहु भसल िोइ ।। 12
इन पंमक्तयों में नागमती ने गहरी अमभव्यंजना की है मक हे परमेश्वर मैं जानती थी तुम मेरे भीतर हो, मकं तु ताक कर देखती हूँ तो तुम सवात्र हो, चूैमक पमत-पत्नी की मस्थमत एक-दूसरे के भीतर है और तुम मजतने मेरी और हो उतना ही अन्यत्र भी, तुम मजतना मेरी ओर हो उतना पदमावती की ओर भी । अतः तुम महान हो । यहाँ जायसी ने एक स्त्री के भाव से जुड़े अनेक मभनमभनाते अथों की व्यंजना की ।
Vol. 3, issue 27-29, July-September 2017. वर्ष 3, अंक 27-29 जुलाई-सितंबर 2017