Jankriti International Magazine / जनकृ सत अंतरराष्ट्रीय पसिका ISSN: 2454-2725
सििप्रिाद सिंह की कहासनयों में ग्रामीण जीिन और िामासजक पररप्रेक्ष्य
कं चन लता यादि भारतीय भार्षा कें द्र जवाहरलाल नेहरू
मवश्वमवद्यालय, नई मदल्ली मोबाइल. 9868329523, ईमेल – klyjnu26 @ gmail. com
मशवप्रसाद मसंह स्वतंत्रता के बाद और नयी कहानी के प्रमुख रचनाकार हैं । भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन के बाद बदले हुए ग्रामीि पररवेश का यथाथापरक और ननन मचत्रि उनकी कहामनयों में मदखाई देता है । उन्होंने व्यमक्त और सममसे के मवघटनकारी मूल्यों की बारीमकयों को पकड़ा ही नहीं बमल्क उसका नकार भी मकया । उन्होंने जब कथा लेखन में प्रवेश मकया तब देश औद्योमगकीकरि, पंचवर्षीय योजना आमद तमाम मवकासमान मूल्यों की तरफ गमतमान था । अम्बेडकर और गाँधी के प्रयास से दमलतों में चेतना सुगबुगा रही थी । गाँव का साममजक ढ़ांचा टूट रहा था । इस तरह की मस्थमत में गाँव का एक बदला हुआ परर्टश्य मदखाई मदया मजसे मशवप्रसाद मसंह ने अपनी कहानी में रूपामयत मकया । उन्होंने अपनी कहामनयों में सामामजक, राजनीमतक, आमथाक, जामतगत आमद मवमवध समस्याओं को अमभव्यक्त
मकया है । इस सन्दभा में मववेकी राय कहते हैं,“ बदले हुए गाँव और मबन बदली हुई गाँव के गरीबों की मनयमत से संबंमधत सवालों को कथाकार मशवप्रसाद मसंह मवमवध कोिों से उठाते हैं । आमथाक सवालों से तीखे सामामजक सवाल हैं ।” 1 इनकी कहामनयों का मूल कथ्य ग्राम जीवन पर आधाररत होने के कारि, इन्हें प्रेमचंद की परम्परा से जोड़कर देखा जाता है । दोनों लेखक ग्रामीि जीवन के कथाकार हैं लेमकन अलग-अलग देश, काल, वातावरि के कारि, दोनों लेखकों की रचना-प्रमक्रया, कथ्य-मशल्प आमद में मभन्नता है । प्रेमचंद के समय साम्राज्यवाद और सामन्तवाद से जनता संघर्षा कर रही थी मजसे उन्होंने कहानी का मवर्षय बनाया । लेमकन मशवप्रसाद मसंह के समय देश आज़ाद हो गया था, जमींदारी उन्मूलन भी हो गया था, जमींदार के रूप में ठेके दार और पू ंजीपमत जैसी शोर्षिकारी शमक्तयाँ पनप रहीं थीं लेमकन सामामजक ढ़ांचे में कोई बदलाव नहीं आया । जमींदारी खत्म होने के बाद भी जमींदारों द्वारा शोर्षि बरकरार है । इस सन्दभा में बच्चन मसंह ने मलखा है,“ परम्परा पर मवचार करते समय स्मरि रखना होगा मक प्रेमचंद का जमाना और था तथा मशवप्रसाद का जमाना और है । प्रेमचंद परतंत्र भारत में मलख रहे थे जो साम्राज्यवाद और सामन्तवाद से जूझ रहा था, महाजनी सभ्यता से टकरा कर मकसान चकनाचूर हो
Vol. 3, issue 27-29, July-September 2017. वर्ष 3, अंक 27-29 जुलाई-सितंबर 2017