Jankriti International Magazine / जनकृ सत अंतरराष्ट्रीय पसिका ISSN: 2454-2725
तरनतारन में बनगामसंह की गद्दी । सामलग्राम के एक मशष्ट्य िह्मशंकर ममश्र( महाराज सामहब) हुए हैं । इनका जन्म सं० 1917 में तथा देहान्त सं० 1964 में हुआ । इनका समामध स्थल स्वामीबाग नाम से मवख्यात है । इनके अनंतर इनकी बड़ी बहन श्रीमती माहेश्वरी देवी( बुआजी सामहबा) गद्दी की उत्तरामधकारी बनी । महाराज साहब के दो अन्य मशष्ट्य कामता प्रसाद तथा ठाकु र अनुकू ल चन्द्र भी क्रमश आगरा तथा पवना( पूवा बंगाल) में अपनी गमद्दयाँ स्थामपत की, बुआजी सामहबा का देहान्त सं० 1969 में हुआ । इनके उत्तरामधकारी माधवप्रसाद मसंह( बाबूजी साहब) बने, कामताप्रसाद( सरकार सामहब) का देहावसान सं० 1971 में हुआ तथा उनकी गद्दी पर उत्तरामधकारी के रूप में सर आनदंस्वरूप( साहेबजी) बैठे । इनके देहान्त के उपरान्त राय साहब गुरुचरन दास मेहता इसी गद्दी के उत्तरामधकारी बने ।
तरनतारन में बनगामसंह की गद्दी के उत्तरामधकारी बाबा देवा मसंह बने, इसके सावनमसंह( व्यास) के मशष्ट्य-प्रमशष्ट्यों में जगतमसंह, चरनमसंह के नाम उल्लेखनीय हैं । 53
उपसंहार:
उत्तर मध्यकाल में लगभग 45 संत संम्प्रदाय और मवमभन्न पंथों में दीमक्षत संतों की एक लंबी परम्परा ममलती है । इन सन्तों ने अपने पंथ प्रचार के तथा मानव महत के मनममत्त जो उपदेश मद, वे ही सन्त वािीके रूप में सामहत्य की अमूल्य मनमध हैं । प्रत्येक पंथ के सभी संतों ने वािी प्रिीत नहीं की, मूलत: सन्त वामियाँ मौमखक रूप में थी, मजन्हें मशष्ट्यों-प्रमशष्ट्यों द्वारा मलमखत रूप में प्रस्तुत मकया गया । उत्तर मध्यकाल एक ऐसा काल रहा है, मजसमें संतों का उत्कर्षा हुआ, चाहे उनमें सम्प्रदायों की होड़ लग गयी थी, परन्तु मुझे तो यह प्रतीत होता है मक यह संत
समाज का स्विा-युग कहा जा सकता है क्योंमक इसमें लगभग 96 संत अवतररत हुए । इनका पररचय भी अपने आप में शोध का मवर्षय है ।
िहायक ग्रंथ िूची:
1-पीताम्बरदत्त बडथ्वाल, महन्दी काव्य में मनगु ाि सम्प्रदाय( लखनऊ: अवध पमब्ल० हाऊस) पृ० 122, 128
2-मवष्ट्िुदत्त राके श, उत्तर भारत के मनगु ाि पंथ सामहत्य का इमतहास( इलाहाबाद: सामहत्य भवन प्रा० मल०1975) पृ० 114
3-मत्रलोकी नारायि दीमक्षत, महंदी संत सामहत्य( मदल्ली: राजकमल प्रकाशन, 1983) पृ० 57
4-मवष्ट्िुदत्त राके श, उत्तर भारत के मनगु ाि पंथ सामहत्य का इमतहास( मदल्ली: राजकमल प्रकाशन, 1963) पृ० 118
5-परशुराम चतुवेदी, उत्तरी भारत की संत परम्परा( इलाहाबाद: भारती भ. डार, 1964), पृ० 291
6-वही, पृ० 427, 428
7-मत्रलोकी नारायि दीमक्षत( महन्दी सन्त सामहत्य( पूवोक्त)), पृ० 58
8-परशुराम चतुवेदी, उत्तरी भारत की संत परम्परा( पूवोक्त), पृ० 431
9-मत्रलोकी नारायि दीमक्षत( महन्दी सन्त सामहत्य( पूवोक्त)), पृ० 58
10-संतनारायि उपाध्याय, दादू दयाल( कलकत्ता: ईश्वर गांगुली स्रीट, 1969), पृ० 22
11-वही, पृ० 52, 53
Vol. 3, issue 27-29, July-September 2017. वर्ष 3, अंक 27-29 जुलाई-सितंबर 2017