Jankriti International Magazine / जनकृ सत अंतरराष्ट्रीय पसिका ISSN: 2454-2725
मकसी पोथी से मछटककर मनु से बहस कर रहा है और रासो की कोई सबसे पुरानी प्रमत धीरे-धीरे गुनगुना रही है मकसी युवा कमव की अप्रकामशत कोई
कमवता 26
उपरोक्त अमद्वतीय मबंबों के अलावा के दार एक नई मशल्प, काव्य का एक नया मुहावरा और एक मबल्कु ल नई भार्षा लेकर महन्दी काव्य जगत में उपमस्थत होते हैं । कहा गया है मक आधुमनकता मवचारों में बदलाव के साथ कला माध्यमों के मशल्प और उसकी अमभव्यमक्त के तरीके में भी बदलाव करती है । के दार जब गीत मलखते हैं, तब भी उनकी भार्षा की ताजगी में उस नयेपन को महसूस मकया जा सकता है । के दार की भार्षा की एक ताकत उनकी सहजता और लोक शब्दावमलयों का कमवता में स्वाभामवक और समटक प्रयोग भी है । के दार कई बार अपनी भार्षा की अमद्वतीयता से चमत्कृ त करते हैं, एक जादू का-सा भाव-जगत रचने में सफल होते है-
झरने लगे नीम के पत्ते, बढ़ने लगी उदासी मन
की उड़ने लगी बुझे खेतों से झुर-झुर सरसों की रंगीनी धूसर धूप हुई मन पर ज्यों – सुमधयों की चादर अनबीनी..। 27
‘ माँझी का पुल’ भार्षा और संवेदना के संगुफन का अद्भुद काव्य है । इस कमवता की एक पंमक्त देखें – मछमलयां अपनी भार्षा में क्या कहती हैं पुल को? सू ंस और घमड़याल क्या सोचते हैं? कछु ओं को कै सा लगता है पुल जब वे दोपहर बाद की रेती पर
अपनी पीठ फै लाकर उसकी मेहराबें सेंकते हैं? 28 के दार की उक्त कमवताओं से हमें उनके भामर्षक सजगता और और उसके प्रयोग की नवीनता का अहसास हो जाता है । ऐसी अनेक कमवताएँ हैं जो उदाहरि स्वरूप यहाँ रखी जा सकती हैं । बकौल के दारनाथ मसंह –“ कमवता का सबसे सीधा संबंध भार्षा से हैं । भार्षा प्रेर्षिीयता का सवासुलभ माध्यम है । अतः‘ शुद्ध कमवता’ जैसी मकसी चीज की कल्पना मबलकु ल बेमानी है ।” 29 जामहर है के दार के मलए भार्षा का महत्व कमवता से भी अमधक है – यह भामर्षक सजगता उन्हें आधुमनकता के एक स्वकीय संसार में ले जाती है, जहाँ के दार सबके के मलए सवा सुलभ लगने लगते हैं । उनकी लोक मप्रयता का एक कारि यह भी है । इस पर ध्यान मदया जाना चामहए ।
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आधुमनकताबोध को जातीय चररत्र ममलता है लोक जीवन से जो आज भी मुख्यतः गाँव का जीवन है । यह अंचलवाद नहीं है, बमल्क आधुमनकता को ममट्टी के सोंधे भुरभुरेपन से जोड़ने का आग्रह है । माझी का पुल के कमव के दारनाथ मसंह में नागाजु ान की तरह देसीपन ममलता है । उन्होंने नई सभ्यता द्वारा मानवीय मूल्य और संवेदना पर उपमस्थत संकट को‘ अकाल और सारस’ के अकाल के रूपक में बांधा है । इस संकट के माहौल में भी आशा के कु छ बचे मजह्न हैं । कोई कह सकता है मक तुच्छता, मवखंडता, और ढोंग के इस सवाग्रासी माहौल में आशावाद बैठेठाले की कल्पना है, यह कमवता के स्वराज में एक सामामजक घुसपैठ है । वस्तुतः जीवन का असल तत्त्व यह आशा ही है । कमवता भी तभी तक है, जब तक आशा है ।
Vol. 3, issue 27-29, July-September 2017. वर्ष 3, अंक 27-29 जुलाई-सितंबर 2017