Jankriti International Magazine / जनकृ सत अंतरराष्ट्रीय पसिका ISSN: 2454-2725
जलनी चामहए’’ । यह सृमसे को बचाए रखने की प्रेमामनन है मजससे चमन में नहीं फू ल मदल में मखलते हैं । आज के समय में लोगों के मदल नहीं ममल रहें, इसमलए उनके मदलों को मफर से ममलाने के मलए यह आग ज़रूरी है । लबों की साफ़गोई और बुराई को देख लेने वाली ्टमसे का नाम है आग । आग, अंधेंरे में अंधेंरे के मख़लाफ मवद्रोह है । उदास मौसम के मख़लाफ लड़ना है आग क्यों मक लड़े मबना कु छ नहीं ममलता । मजजीमवर्षा है आग, जो सृजनशीलती मवरोधी ताकतों के हर मकए धरे पर घास की तरह उग आती है । सपने का न टूटना है आग, इस सपने को बचाए रखने के मलए काल से होड़ है आग‘ क्योंशक सबसे ख़िरनाक होिा है हमारे सपनों का मर जाना ।’ 45 संक्षेप में आग इस सृमसे को बचाए और बनाए रखने के मलए संघर्षा की मशाल है । मजसकी सत्यता के मलए हुक्मरान कमवता की मनम्नमलमखत पंमक्तयों को देखा जा सकता है-
‘‘ आग भरोसा है सृमसे का जो इस भरोसे के मख़लाफ़ है उन्हें पहचानों
उन्हें पहचानों?
क्या उस देश के मजसकी पंसंद का प्रधान हमारे देश का हुक़्मरान है अब’’ 46
कमव बच्चों की तरह कोमल शब्दों का महमायती है न मक बनावटी, कठोर व कका र्ष । कोमल शब्दों की तान मचत्ताकर्षाक व मनोहर होती है मजससे मन शीतल हो जाता है । जैसे मक रहीम दास ने भी कहा है मक- बानी ऐसी बोमलये, मन का आपा खोय । औरन को सीतल करै, आपहु सीतल होय ॥ यह कथन िब्द बच्चों की िरह कमवता से सत्यमपत हो जाता है –
मेरे भीतर कोमल शब्दों की एक डायरी होगी ज़रूर मेरे कमवता में मस्त्रयाँ बहुत हैं मेरा मन स्त्री की तरह कोमल है मुझसे संभव नहीं कठोरता मैं नमागुदाज़ शब्दों से ढका हूँ अगर सूरज भी हूँ तो एकदम भोर का और नमस्कार करता हूँ अभी भी झुककर मैं न पूरी विामाला याद रख पाता हूँ न व्याकरि
हर बार लौटता हूँ और भूला हुआ याद आता है ठोक- पीटकर जो गढ़ते है ँशब्द
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वही, सबसे ख़तरनाक / पाश
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संपादक; सत्यकाम, समीक्षा / समीक्षा एवं शोध त्रैमाससक, अक्टूबर-माचच, 2017, वर्च 49, अंक 3-4, पृ.
Vol. 3, issue 27-29, July-September 2017. वर्ष 3, अंक 27-29 जुलाई-सितंबर 2017
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