Jankriti International Magazine Jankriti Issue 27-29, july-spetember 2017 | Page 305

Jankriti International Magazine / जनकृ सत अंतरराष्ट्रीय पसिका ISSN: 2454-2725
प्रहार करती नजर आती है ।‘ संसद भवन’ प्रवंचना भवन बनता जा रहा है । यहाँ ध्यान मदया जाना चामहए मक,‘ प्रजातंत्रीय-व्यवस्था’ में धूममल की आस्था है । अन्यथा इसका उल्लेख बारम्बार नहीं होता । धूममल ऐसे रचनाकार हैं, मजन्होंने‘ मदनकर’ की तरह यह आह्वान नहीं करते मक‘ मसंहासन खाली करो मक जनता आती है’ बमल्क जनता की ओर से चुने गये सांसदों से मनममात संसद को अपने शब्दों के नुकीले हमथयारों से आहत करते हैं । प्रजातंत्र पर धारदार कमवताएँ मलखने की अगुवाई धूममल ने की ।‘ जनतंत्र के सूयोदय में’,‘ शहर में सूयाास्त’ जैसी कमवताएँ इसके उदाहरि हैं ।
2.2.‘ मोचीराम’-
‘ पेशेवर हाथों’ और‘ फटे हुए जूते’ के बीच कोई आदमी है । मोचीराम उस आदमी का ख्याल हमेशा रखता है । इसके बाद मोचीराम जूतों के प्रकार के आधार पर दो वगों के लोगों की चच ा करता है । मोचीराम कहता है-“ यहाँ तरह-तरह के जूते आते हैं / और आदमी की अलग-अलग‘ नवैयत’/ बतलाते हैं / सबकी अपनी-अपनी शक्ल है / अपनी-अपनी शैली है / मसलन एक जूता है / जूता क्या है- चकमतयों की थैली है ।” 6
उपयु ाक्त उद्धरि में मोचीराम एक मवशेर्ष वगा के लोगों की बात करते हैं मजसके पास जूता नहीं बमल्क‘ चकमतयों का थैला’ लेकर आता है और उसकी मरम्मत करवाने को कहता है । मजसे देखकर मोचीराम को भी लगता है मक उस जूते पर बेकार ही
इस कमवता में धूममल ने जूतों के प्रकार के द्वारा
वगावादी ्टमसेकोि को लमक्षत मकया है । कमवता का
आरम्भ ही बड़े नाटकीय ढंग से होता है-“ राँपी से उठी
हुई आँखों ने मुझे / क्षि-भर टटोला / और मफर / जैसे
पमतयाये हुए स्वर में / वह हँसते हुये बोला- / बाबूजी!
सच कहूँ- मेरी मनगाह में / न कोई छोटा है / न कोई
बड़ा है / मेरे मलए, हर आदमी एक जोड़ी जूता है / जो
मेरे सामने / मरम्मत के मलए खड़ा है ।” 4 यहाँ मोचीराम
का‘ हर आदमी एक जोड़ी जूता है’ का कथन वस्तुत:
उसके पेशे की ्टमसे से हर आदमी को एक जोड़ी जूते
के रूप में देखना है । यह उनका एक तरह का
समतावादी ्टमसेकोि है । लेमकन वह मनुष्ट्य-मनुष्ट्य में
समतावादी ्टमसेकोि अपनाकर भी विा-भेद की
पैसा फू का जा रहा है । पर दूसरे ही क्षि वह संभल
जाता है और महसूस करता है मक जो वह सोच रहा है
अगर बोल देगा तो अपने ही जामत पर थूके गा । वह भी
तो इसी वगा का आदमी है । धूममल ने इस कमवता के
माफा त मोचीराम के बड़प्पन को और उसके जीवन को
आँकने वाली सूक्ष्म ्टमसे को उसकी शब्दावली में कु छ
इस तरह अंमकत करते हैं-“ बाबूजी! सच कहूँ- मेरी
मनगाह में / न कोई छोटा है / न कोई बड़ा है / मेरे मलए,
हर आदमी एक जोड़ी जूता है / जो मेरे सामने / मरम्मत
के मलए खड़ा है ।” 7 यहाँ मोचीराम का‘ हर आदमी एक
जोड़ी जूता है’ का अथा उसके पेशे की ्टमसे से प्रेररत
है, मोचीराम अपने पेशे की ्टमसे से ही हर आदमी को
एक जोड़ी जूते के रूप में देखता है ।
कल्पना से अपने आप को अलग नहीं रख सकता ।
मोचीराम अलग-अलग आदममयों की
वह कहता है-“ मफर भी मुझे ख्याल रहता है / मक
मनयती एवं प्रकृ मत का खुलासा करता है, जो आज की
पेशेवर हाथों और फटे हुये जूतों के बीच / कहीं-न-कहीं
भागदौड़ और अंहकार को मबमम्बत करता है ।
एक अदद आदमी है / मजस पर टाँके पड़ते हैं,/ जो जूते
मोचीराम अपनी मजजीमवर्षा और संघर्षा चेतना और
से झाँकती हुई अँगुली की चोट छाती पर / हथौड़े की
आदममयत का बयान करता है । धूममल इस कमवता के
तरह सहता है ।” 5 मोचीराम को स्वीकारना पड़ता है मक
माध्यम से हर मस्थमत और पररमस्थमत में एक अदद
Vol. 3, issue 27-29, July-September 2017.
वर्ष 3, अंक 27-29 जुलाई-सितंबर 2017