Jan 2026_DA | Page 9

जनमवदवस आंबेडकर ज्यंती के रूप में पूरी दुवन्या में मना्या जाता है । बचिपन में वे भिवा, भीम, भीमराव के नाम से जाने जाते थे लेकिन आज हम सब उनहें बड़े आदर के साथ बाबा साहेब आंबेडकर के नाम से पुकारते हैं । वे बचिपन से ही प्रतिभाशाली छात् थे और उनहोंने कोलंवब्या वव्वविद्याल्य तथा लंदन स्कूल ऑफ इकलॉनोवम्स दोनों ही वव्वविद्याल्यों से अर्थशासत् में डलॉ्टिोरेटि की उपावध्यां हासिल की । अर्थशासत् के साथ विधि एवं राजनीति विज्ञान में भी शोध का्य्ष वक्या । प्रारंभ में वे अर्थशासत् के प्रोफेसर रहे, वकालत भी की, लेकिन बाद में वे राजनैतिक गतिवववध्यों में सशममवलत होकर भारत की वासतविक सवतंत्ता, सामाजिक सवतंत्ता तथा आर्थिक सवतंत्ता के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर वद्या ।
उस सम्य हिंदू धर्म में अनेक कुरीवत्यां, छुआछूत और ऊंचि-नीचि की प्रथा्यें प्रचिलन में थीं । जिसके लिए उनहोंने अथक संघर्ष वक्या । वे स्वयं दलित वर्ग से समबशनधत थे । छुआछूत के दंश को, समाज में व्यापत सामाजिक असमानता, जाति-व्यवस्ा, शूद्रों के साथ होने वाले अमानवी्य व्यवहार को उनहोंने अपने बाल्यकाल से देखा-जाना और भोगा था । उस भोगे हुए जीवन-्य्ार्थ से उनहें प्रत्येक प्रकार की सामाजिक असमानता के लिए आवाज उठाने की प्रेरणा मिली । उनका मानना था कि“ छुआछूत गुलामी से भी बदतर है ।” सन 1927 तक डलॉ. आंबेडकर ने छुआछूत के विरूद्ध एक सवरि्य आंदोलन प्रारंभ वक्या और सार्वजनिक आंदोलन, सत्याग्ह और जुलूसों के माध्यम से पे्यजल के सार्वजनिक संसाधन समाज के सभी वगकों के लिए खुलवाने का प्र्यास वक्या । वे निरंतर हिंदू समाज को सुधारने, समानता लाने के लिए प्र्यास करते रहे, लेकिन कुप्रथाओं की जड़ें इतनी गहरी थीं कि उनका समूल उनमूलन उनहें कठिन लगने लगा । एक बार तो वे गहरी हताशा में कहते हैं कि“ हमने हिंदू समाज में समानता का सतर प्रापत करने के लिए हर तरह के प्र्यास और सत्याग्ह किए, परंतु सब निरर्थक सिद्ध हुए । हिंदू समाज में समानता के लिए कोई
स्ान नहीं है ।”
इसका परिणाम ्यह हुआ कि 14 अक्टूबर, 1956 को नागपुर में उनहोंने अपने 3.85 लाख समर्थकों के साथ बौद्ध धर्म को अपनाते हुए वंवचित दलित समुदा्य को नवीन धार्मिक, अध्याशतमक, नैतिक मूल्यों, रीति रिवाजों की एक जीवंत परंपरा प्रदान की । उनहोंने भारती्य समाज व्यवस्ा, जाति व्यवस्ा, धर्म का, अर्थ-तंत्, वंवचित वर्ग के अधिकार, मजदूरों और कामगारों का हित, महिला-अधिकार, व्यवस्ावपका, का्य्षपालिका एवं सरकारी सेवा में दलित वर्ग के सवाभाविक प्रतिनिधिततव के साथ ही शिक्षा, ज्ञान-विज्ञान आदि मुद्ों पर सर्वाधिक तार्किक ढ़ंग से सोचिा-ववचिारा और अपने वन्करकों को हमारे सामने रखा । वे एक बहुपठित और बहुज्ञ व्यक्ततव के सवामी थे. उनका वैचिारिक-पक्ष न्या्योवचित एवं मानवी्य था । उनका समपूण्ष जीवन और वैचिारिक-भूमिका भारती्य समाज और चिेतना में समरसता को स्ावपत करने हेतु न्या्योवचित परिवर्तन के लिए समर्पित रहा ।
उनहोंने अपनी श्मसाध्य ज्ञानातमक प्र्यासों
से ्यह पा्या कि भारती्य समाज व्यवस्ा में निहित संरचिनाएं, जैसे, जाति-व्यवस्ा, वर्ण- व्यवस्ा, असपृ््यता, ऊंचि-नीचि, शोषण, अन्या्य आदि बाद के दिनों में आ्ये विभिन्न गतिरोधों एवं विककृवत्यों की उपज हैं न कि प्राचिीन भारती्य समाज-व्यवस्ा का मूल सवभाव । भारती्य समाज व्यवस्ा, आर्थिक तंत्, राजनैतिक प्रवरि्याओं एवं सभ्यता की उपलब्धियां तथा दुविधाओं के प्रति बाबा साहेब का समझ अतुलनी्य है । अपनी इसी विशिष्ट प्रतिभा के चिलते वे सवतंत् भारत के प्रथम विधि एवं न्या्य मंत्ी बने । वह भारती्य संविधान के जनक एवं भारती्य गणराज्य के निर्माताओं में से एक थे । उनके भारती्य संविधान के अभूतपूर्व ्योगदान के लिए उनहें‘ भारती्य संविधान का पितामह’ कहा जाता है । सन् 1951 में उनहोंने‘ भारत के वित्तीय कमीशन’ की स्ापना की ।
डलॉ. आंबेडकर की अंतिम पांडुलिपि“ द बुद्धा एंड हिज़ धमम” को पूरा करने के 3 दिन पश्चात्, उनकी मृत्यु 6 दिसंबर, 1956 को वद्ली में नींद में ही हो गई पर आज भी वे‘ बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर’,‘ ज्य भीम’,‘ एक महाना्यक’ के रूप में अमर हैं । गूगल द्ारा उनके 124वें जनमवदवस पर एक होम पेज Doodle( डूडल) प्रारंभ वक्या ग्या । डलॉ. अमबेडकर कहा करते थे,“ हम शुरू से लेकर अंत तक भारती्य हैं और मैं चिाहता हूँ कि भारत का प्रत्येक मनुष्य भारती्य बने, अंत तक भारती्य रहे और भारती्य के अलावा कुछ न बने ।”
ऐसे ्युग निर्माता के जनमवदवस पर हम सभी भारती्यों के लिए उनका संदेश“ शिक्षित बनो, संगठित बनो, संघर्ष करो” प्रेरणा का स्ोत बना हुआ है । भारती्य संविधान में बहुमूल्य ्योगदान इस देश को एक नई दिशा देने वाले बाबा साहेब समता, सवतंत्ता और समरसता के सौन्दर्य के सवाभाविक प्रतीक पुरुष थे । उनके रिांवतकारी ववचिार और वन्कर्ष, उनके द्ारा खोजे और पा्ये ग्ये प्राथमिक स्ोतों पर आधारित हैं । इसीलिए वर्तमान सम्य में भी उनके ववचिारों की प्रासंगिकता बनी हुई है बल्क ्यूं कहें कि और बढ़ गई है ।
( साभार)
tuojh 2026 9