Jan 2026_DA | Seite 50

साहितय

दलित चेतना का हो रहा विसताि
रंजीत ने वनदमेशक मारी से्वराज की पहली वफ्म पेरर्यारम पेरुमल को प्रोड्ूस वक्या । ्यह वफ्म एक कार्ड जिस पर लिखा होता है " जाति और धर्म मानवता के वख़लाफ हैं " से शुरू होती है । इस वफ्म का ना्यक बाबा साहब आंबेडकर की तरह ही वकील बनना चिाहता है । इस वफ्म में एक सीन है, जिसमें 1983 के वफ्मी गीत पोरादादा पर कुछ मर्द नाचि रहे हैं । इस गाने का संगीत महान संगीतकार और ख़ुद एक दलित इलै्याराजा ने वद्या है । गाने के बोल हैं, " हम आपका सिंहासन संभालेंगे /... जीत के लिए हमारी पुकार सुनी जाएगी / हमारी रोशनी इस दुवन्या को चिकाचिौंध कर देगी / हम सर्वहारा हैं तो लड़ेंगे ।" ्यही गीत से्वराज की वफ्म कर्णन( 2021) की पृ्ठभूमि में भी बजता है । अब ्यह ' दलित गीत ' के रूप में जाना जा रहा है ।
सुपरस्टार भी हो रहे आकर्षित और प्भावित तमिल सिनेमा के सुपरस्टार रजनीकांत का
रंजीत की वफ्मों को वहटि करने में बड़ा ्योगदान रहा । रजनीकांत इन वफ्मों की कहावन्यों से प्रभावित होकर लीड रोल करने को राज़ी हुए । उनहोंने कबाली( ्यह मलेवश्या के एक तमिल प्रवासी गैंगस्टर की कहानी है) और काला( ्यह वफ्म एवश्या के सबसे बड़े सलम की कहानी है, जहाँ बड़ी तादाद में तमिल प्रवासी रहते हैं) में काम वक्या । और नई वफ्म सरपट्टा परंबराई में रंजीत ने चिेन्नई के दलितों के बीचि मु्केबाज़ी संस्कृति को खोजा, जो मोहममद अली से गहराई से प्रभावित था । वे केवल उनके खेल से ही नहीं बल्क वव्यतनाम ्युद्ध से लेकर अमेरिका में नसलभेद के वख़लाफ उनके संघर्ष से भी प्रभावित थे ।
दलित चिंतन की धुरी पर नाच रहा सिनेमा
हालांकि कई लोग ऐसे भी हैं जो मानते हैं कि मौजूदा दौर की वफ्मों के सारे दलित किरदार तारीफ के क़ावबल नहीं हैं । 2019 में आई वफ्म ' मादाथी: एन अनफ़ेयरी टिेल ' की वनदमेशक लीना मणिमेकलई का मानना है कि
नए सिनेमा ने कोई ख़ास बदलाव नहीं वक्या है । वो कहती हैं कि नई वफ्मों के ना्यक, उनकी ख़ासियतें और कहानी का मूल सब पहले जैसा ही है । वो कहती हैं कि महिला किरदारों की भूमिकाएं भी पहले जैसी ही हैं । लेकिन इस बात से कोई इनकार नहीं कर रहा कि अब दलित वचिंतन काफी तेजी से मुख्यधारा की सिनेमा पर हावी हो रहा है । हालांकि इस भेड़चाल में ऐसी वफ्में भी बन रही हैं जिसे देखकर ऐसा लगता है मानो पुरानी बोतल में इस तरह की नई शराब भरी जा रही है जिसके केनद्र में दलित वचिंतन रहता है । निश्चित तौर पर ्यह तो कहा ही जा सकता है कि ्यह दलित समाज की मुखरता और जागरूकता ही नहीं बल्क एकजुटिता और सश्तता का भी प्रतीक है कि प्रबुद्ध वर्ग को केनद्र में रखकर घूमता आ रहा सिनेमा अब दलित वचिंतन के कलेवर की धुरी पर नाचिता दिख रहा है । वासतविकता ्यही है कि तमाम कवम्यों व खावम्यों के बाद भी दलित वचिंतन की धुरी पर केशनद्रत वफ्मों का बनना आवश्यक भी है और अपेक्षित भी । �
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