Jan 2026_DA | Page 47

नाटिक के आरंभ में नांदी वचिन के रूप में आती है । '' सम्य-सम्य पर वर्षा हो, खेतों की फसलें इल्लियों से रहित हों और खलिहान हमारे कोठों को भरें, गांव-गांव आरोग् ्य हो, किसी को कोई आधि-व् ्याधि नहीं हों, गा्यें और अन् ्य पशुधन रोग मुक्‍त हों और प्या्षप्‍त दूध प्रदान करें ।'' गौरजा देवी के दरबार में ्यह व्रत वल्या जाता है । इसका कलाकार फसल नहीं उजाडता, न मांदल जैसा बाजा जमीं पर रखा जाता है । सभी मद्यपान से दूर रहते हैं । आदमी ही गवरी करते हैं और औरतें उनके स्‍वास्‍थ् ्य के लिए गौरजा के दरबार में इसके लिए प्रतिदिन प्रार्थना करती हैं । चिालीस से ज् ्यादा नाटिक खेले जाता है । क् ्या देवी-देवता की कथा और क् ्या लोकरंजक आख् ्यान । नौ ही रस, तांडव और लास् ्य, पूरा का पूरा काव् ्य शास् त्, पुराण शास् त्, नाट्य शास् त् इसमें दिखाई देता है । जन से लेकर अभिजन तक के ख् ्याल । बूवड्या, दो राइ्यां, भोपा, कुटिकवड्या । पांचि कलाकार मांझी होते हैं और बाकी भी वंश परंपरानुसार रमते हैं । श्ाद्ध पक्ष तक रमण होता है ।
40 दिनों तक ' बाजा कंधे और बंद सब धंधे '
मेवाड़ अंचिल में होने वार्षिक लोकनृत् ्य- नाट्य ' गवरी ' का श्ाद्धपक्ष में समापन होता है । ्यहां बसे भील-गमेती आदिवावस्यों में गवरी का आ्योजन अनुष्‍ठान की तरह वक्या जाता है । राखी के बाद इसका व्रत वल्या जाता है । गवरी तमाम नाटिकप्रेवम्यों और सिने-रंगप्रेवम्यों के बीचि एक ऐसा नाट्य अनुष्‍ठान है जिसके आ्योजन के मूल में ' नांदी वचिन ' जैसी वह भावना विद्यमान है जो नाट्यशास् त् में भरत मुनि करते हैं और संस्‍ककृत के लगभग सभी नाटिकों में लोक से ग्हण की गई है-- '' सम्य पर वर्षा हो, पृथ्‍वी पर सुभिक्ष हो, गा्यें स्‍वस्‍थ हों और पयस्विनी होकर प्या्षप्‍त दूध प्रदान करें । बहु-बेवटि्यां प्रसन्‍न हों, निरोगी, वचिरा्यु और समृद्धशाली हों । राज् ्य भ्यमुक्‍त हों ।'' नाटिक के आ्योजन के मूल में ्यही भाव नाट्यशास् त् के रचिव्यता को अभिप्रेत रहा है । ्यह व्रत इसलिए है कि 40 दिन तक गवरी दल
के सदस् ्य न हरी सब्‍जी खाते हैं न ही पांवों में जूते पहनते हैं । वे परिवार से पूरी तरह दूर रहते हैं और किसी देवाल्य में ही विश्ाम करते हैं । न कमाने की वचिंता न ही खाने का ख् ्याल । बाजों को जमीन पर नहीं रखा जाता । बाजा कंधे और बंद सब धंधे ।
प्ार जाए पर पेड़ न जाए
इस दिन प्रा्य: जो ख् ्याल वक्या जाता है, वह ' बड़लिया हिंदवा ' का होता है । इसके मूल में कथानक उन नौ लाख देवव्यों का है जो पृथ्‍वी पर हरर्याली के लिए नागराजा वासुकी बाड़ी से पेड़ों को लेकर आती है । आम लाने वाली देवी अंबा कही जाती है, नीम लाने वाली देवी नीमज और पीपल लाने वाली पीपलाज ।
देवव्यों के नामकरण का स्ाेत भी गवरी की प्रस्‍तुति में समाहित होता है । देवव्यां उन पेड़ों का रोपण करती है किंतु वे राजा जैसल से ्यह आश्‍वासन चिाहती है कि पेड़ की हर हाल में सुरक्षा होगी । राजा वचिन देता है कव उसका सिर कटि जाए, मगर कोई पेड़ नहीं कटिेगा । देवी उसके वचिन की परीक्षा लेने के लिए वरजू कांजरी बनकर आती है । दूसरी ओर हरर्याली को उजाड़ने के लिए आबू के पहाड़ से भावन्या जोगी अपने चिेलों के साथ आता है और राजा को बरगला कर बरगद पर कुल्‍हाड़ा चिला देता है । पहले वार में दूध की धारा फकूटिती है, दूसरे वार में पानी और तीसरे में रक्‍त की धारा फकूटिकर सृष्टि में हाहाकार मचिा देती है । ्यह ख् ्याल वस्‍तुत: प्या्षवरण की सुरक्षा का पाठ पढ़ाने वाला प्राचिीनतम ख् ्याल है कि हर कीमत पर पेड़ बचिने चिाहिए । ब्ह्मवैवर्तपुराण के प्रककृवतखंड में, पद्मपुराण के सृष्टिखंड, ककृवर
पराशर, काश् ्यपी्य ककृवर पद्धति आदि में इस प्रकार की मान् ्यताओं को संजो्या ग्या है मगर उनका वासतविक व्यावहारिक सवरूप लोक की ऐसी ही मान् ्यताओं में देखा जा सकता है ।
घड़ावण और वलावण यानी तैयारी और विसर्जन
जिस किसी भी गांव में गवरी नर्तन का व्रत वल्या ग्या, वहां इन दिनों समापन के दो-दो उत्‍सव मनाए जा रहे हैं । घड़ावण और वलावण अर्थात् तै्यारी और विसर्जन । घडावण के दिन खाटि पर काली खोल चिढ़ाकर हाथी बना्या जाता है और इंद्र की सवारी निकाली जाती है । विसर्जन के लिए गजवाहिनी पार्वती ' गौरजा माता ' की मृण्‍म्यी मूर्ति बनाई जाती
गवरी एक आदिम नृत्‍य नाट्य है, जिसका पूरा ही रूप आनुष्‍ठानिक है । भरताचार्य ने नाट्य के जितने जितने रूपों को लिखा है, करीब-करीब सभी को गवरी अपने में समेटिे हुए है । न केवल पात्ों का वेश विन्‍यास, बषलक संवाद, षस्हत और स्‍थान तक भी । गवरी एक व्रत से कम नहीं ।
है और उसको सजा-धजाकर गांव में सवारी निकाली जाती है । पूरे रास्‍ते पर गवरी के सभी मांजी पात्- बूवड्यां, भोपा, दोनों राइ्यां, कुटिकुवटि्या आदि खेलों को अंजाम देते चिलते हैं और थाली के साथ मांदल( मर्दल, पखावज) बजते हैं: दींग-बिदिंग, दींग-बिदिंग । केलवाड़ा-कुंभलगढ़ के पास शस्त हमीर की पाल जलाश्य पर भी विसर्जन बहुत धूमधाम से होता है । अरावली की पहाडि़्यों में बसे भीलों के टिापरों से ही नहीं, आसपास के गांवों से भी भीड़ उमड़ पड़ती है । बहुत उल्‍लासपूर्ण वातावरण में गवरी के व्रत का समापन होता है । कलाकारों के लिए रिश्‍तेदारों द्ारा पहनावे-पोशाक आदि ला्ये जाते हैं । पहिरावनी होती है और मान-मनुहार के दौर चिलते हैं । विसर्जन के बाद चिालीस दिनों तक लगातार थिरकने वाले पांव अपने घर की ओर लौटि जाते हैं । �
tuojh 2026 47