Feb 2026_DA | Page 8

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उनिें धरातम्म् एवं सरांस्कृतिक ्राय्मक्रमों को करने से रोकने के सराथ ही सराथ अनरावशय् शु्् एवं कर देने पड़ने थे । लोगों को दरबदर होकर अपनी भदूतम एवं घरों को खोनरा पिरा । विदेशी मुससलम आक्ररान्ता शरासकों द्वाररा बराधय होकर मैलरा ढ़ोने, मरे पशुओं को ढोने एवं चर्मकर्म करने के ्रारण उनिें अपनी ही जराति तथरा वर्ग में सरामरातज् प्तिष्ठरा से िराथ धोनरा पिरा । गो-चर्म के ्राम में लगने के ्रारण हिन्दू समराज में भी उनिें अपतवत्ररा एवं अछूत की संज्ञा प्रापत हुई । इस प्रकार वे आर्थिक िरातन उ्ठरा्र भदूतम एवं आवरास खोकर, और विवश होकर असवि कार्यों में लगकर अपनी जराति तथरा हिन्दू समराज में आतम प्तिष्ठरा खोकर दलित पहचरान के रूप में समराज में स्थापित होते चले गये । यह तनतव्म्रार एवं निषपक्षतरापदूण्म तथय है कि विदेशी मुसलमरानों एवं मुगल आक्ररान्ता शरासकों द्वाररा दलन करके हिन्दू धर्म मरानने वराले धमरा्मतभमरानी एवं स्वाभिमरानी लोगों को दलित बनरा दियरा गयरा ।
हिन्दू समराज में बड़े तीव्र गति से हो रहे परिवर्तन के सराथ तत्कालीन समय में स्वाभिमरानी, धमरा्मतभमरानी एवं हिन्दू धर्म की रक्षरा के लिए संघर्ष करने वराले योद्धा और वीरों को दबरा्र, कुचलकर एवं उन्रा बलपदूव्म् दलन करके उनिें दलित बनरायरा गयरा जो हिन्दू समराज के लिए चिन्ता के सराथ एक चिनतन ्रा विषय थरा । विदेशी आक्ररान्ता मुससलम शरासकों की दुभरा्मवनरा के ्रारण हिन्ुओं ्रा अससततव खतरे में थरा । मुससलम आक्ररान्ताओं ्रा उतपीिन एवं अत्याचरार मरानवतरा के समक्ष एक चुनौती थी । अससततव की लिराई लड़ रहे हिन्दू समराज को सनत रै्रास के रूप में एक धु ंधले प्रकाश पुनज ्रा दर्शन प्रापत हुआ । गुरु रतव्रास द्वाररा हिन्दू समराज को भसकत के आधयरासतम् रस में डुबरा्र और लररातरार अपने आपको उनिीं के
समराज ्रा प्तिनिधि होने ्रा आभरास कररानरा, उनकी ्दूरदृष्टि ्रा एक महतवपदूण्म उ्रािरण है । वह सव्म्रा अपने आपको रै्रास चमराररा’ इत्यादि शब्ों से समबोतधत कर विदेशी आक्ररान्ता शरासकों द्वाररा बलपदूव्म् बनराए गए लराखों-लराख चर्म-्मटी यरा तथरा्तथत चर्म्रार जराति के लोगों को आधयरासतम् एवं मरानसिक बल देने ्रा ्राय्म कियरा I वह उनिें धर्म के प्ति दृढ़ रहने एवं खोए हुए सम्मान तथरा स्वाभिमरान को प्रापत करने के लिए उपदेशित करते रहे ।
सनत शिरोमणि गुरु रतव्रास सरामरातज् समरसतरा के क्षेत्र में सवयं एक उ्रािरण थे । भकत सिद्धा मीरराबराई ने अपने आरराधय भगवरान् श्री्कृषण के ईशवरीय ततव ्रा गुरु रतव्रास के चरणों में रहकर आभरास कियरा । मीरराबराई के
भसकत मरार्ग ्रा अनुसरण करते हुए ित्ररापति रराजरा मिरारराणरा संग्रराम सिंह की ररानी झराली एवं उनके बरा् सवयं मिरारराणरा संग्रराम सिंह भी गुरु रतव्रास की शरण में आए I समरातज् भेदभराव एवं असपृशयतरा की मरानसिकतरा में बं्टे तत्कालीन हिन्दू समराज ने भी कभी इसकी चिन्ता नहीं की कि गुरु रतव्रास एक दलित परिवरार एवं जराति के सदसय थे । ्राशी में हरूजनमें सनत शिरोमणि गुरु रै्रास को मिराररानी झराली, वरारराणसी से चित्तौड़ दुर्ग ले आईं । नितय उनके पैर पखरारने एवं चरण रज लेने वराले रराजराओं के रराजरा मिरारराणरा संग्रराम सिंह उनके अननय शिषय थे । ्राशी नरेश एवं हजरारों ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैशयों के सराथ तत्कालीन तथरा्तथत दलित समराज के लोगों द्वाररा सनत रतव्रास की गुरु भसकत उनके समरसतरा के संदेश एवं प्खर आधयरासतम् भराव में डूबी हुयी गुरुबरानी उनको सराथ्म् एवं समराजोपयोगी तसधि करती है ।
सनत शिरोमणि गुरु रतव्रास तत्कालीन विदेशी मुगल शरासकों के षड़यंत्र एवं धर्म-परिवर्तन के योजनरानुसरार प्यरास कर रहे दुष्ट एवं चरालरा् फकीरों के सराथ शरासत्ररार्थ करके उनके षड़यंत्र को लररातरार विफल करते रहे । सनत शिरोमणि गुरु रतव्रास की अनेकों बरार विदेशी आक्ररान्ता मुसलमरान शरासकों के सराथ भिड़नत भी हुई । मुसलमरान शरासकों एवं फकीरों को पररासत करके उनिें हिन्दू बनराने ्रा ्राय्म भी गुरु रतव्रास द्वाररा समपन् हुआ । इस प्रकार उनके ऐसरा करने से दलित हिन्ुओं को सरािस, बुतधिमत्तरा, दृढ़तरा एवं हिन्दू धर्म के सराथ अडिग रहने की प्ेरणरा तथरा सहनशीलतरा प्रापत हुई । सनत शिरोमणि गुरु रतव्रास द्वाररा दलित हिन्ुओं को हिन्दू धर्म की रक्षरा के संघर्ष को गतिशील रखने की महनीय प्ेरणरा मिली । �
8 iQjojh 2026