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गोविंद निहलानी , मीरा नायर , दीपा मेहता जैसे मनदचेशकों की वजह से मुद्े और नायक की परिभाषा बदली । उधर बाजार की सत्ा मद्ज नियंमत्त होने के कारण , सामंती मानसिकता वाले पुरुषों के आधिपतर में सत्ी आइटिम गर्ल और हीरो की सहगामिनी बनकर रह गई । इधर दलित उपेमक्त रह गया ।
भारतीय सिनेमा की समझ को देखें तो , हिनदी सिनेमा की तुलना में हलॉलीवुड फिलम ने चिररत् , लेखन , इतिहास आदि पर जरादा संजीदगी से काम किया है । कहीं न कहीं यह अमेरिकी समाज के बदलावों को भी प्रतिबिंबित करता है । यही वजह है कि अमेरिका के प्रेसिडेंटि एक नायक की तरह बराक ओबामा बन पाते हैं । काले लोगों के जीवन पर आधारित , संघर्ष और सच्ची घटिनाओं का हलॉलीवुड फिलमों में भरमार है । यहाँ काले नायक किसी भी गोरे नायक से कम नहीं । सामाजिक नरार की इचछाशक्त साफ- साफ झलकती है । जिसमें कुछ कमियां हो भी तो , नजरअंदाज किया जा सकता है , ्रोंकि संभावना बहुत है ।
अ्िेत लोगों को केंद्र में रखकर बनी कुछ पलॉपुलर सुपर हीरो की फिलमें जिनमें- कैटििुमन 2004 , हैनकलॉक 2008 , बलेड 1998 -2004 , स्टोर्म का चिररत् फ़िलम ए्स मैन 2000-2014 , बलैक पैंथर 2019 ( सबसे प्रसिद्ध अ्िेत सुपर हीरो ). इन फिलमों के अ्िेत किरदार वहाँ की फिलमों में 21वीं सदी के सुपर हीरो हैं । इसमें कोई दो राय नहीं की ्िेत सुपर हीरो सुपरमैन , सपाइडर मैन , बैटिमैन इतरामद की प्रसिद्धि जरादा है । इसके बावजूद नजरिया मायने रखता है और इसी नजरिए में महिला सुपर हीरो ‘ वंडर वुमन ’, ‘ सुपर गर्ल ’, ‘ सटिलॉम्य ’ इतरामद के किरदार भी नजर आते हैं । यह बदलाव का नजरिया हीं है , जिसकी वजह से बाजार में ‘ बलैक सुपर हीरो ’ और ‘ महिला सुपर हीरो ’ की सिीकृति और प्रसिद्धि बढ़ी है ।
20 के दशक में काले लोगों को केंद्र में रखकर कई सुपर हीरो फिलम बन चिुकी थी । इसके अलावा काले लोगों को केंद्र में रखकर कई बेहतरीन महटि फिलमें जिनमें - ‘ रेस ’ 2016 जो जेसी ओवेंस की जिंदगी पर आधारित थी ,
‘ रिमेंबर द टिाइटिंस ’ एक बलैक फुटिबलॉल कोचि की जिंदगी पर आधारित , ‘ अली ’ 2001 , ‘ ट्वेलि ईयर ए सलेि ’ 2013 , साल 2015 में आई फ़िलम “ द मैन हू नरू इनफिमनटिी ” जो भारत के महान गणितज्ञ रामानुजन की जिंदगी पर आधारित है । फिलम में एक भारतीय के साथ नसलीर पूर्वाग्रह का वह रूप दिखाई पड़ता है जो अ्िेतों के समान है । एक ्िेत प्रोफेसर हाडटी की वजह से रामानुजन उस मुकाम तक पहुंचि पाते हैं , जिसे आज हमसब जानते हैं ।
ऐसी कई हलॉलीवुड की फिलमें हैं , जिनकी तुलना हिनदी फिलमों के गिने-चिुने दलित केंद्रित फिलमों से की जा सकती है । इन फिलमों की सिीकार्यता सिर्फ काले लोगों के बीचि नहीं अपितु अमेरिका में रह रहे कई ्िेत लोगों के बीचि भी उतनी ही प्रसिद्धि के साथ प्रिय है । इसलिए भी , जब जलॉज्य फ्लॉयड नामक एक अ्िेत की मई 2020 में , ्िेत पुलिसवालों की वजह से मृतरु हो जाती है , तो उसके समर्थन में अमेरिका के हर रंग के लोग एक साथ खड़े नजर आते हैं । अमेरिका के इतिहास में अ्िेत आनदोलनों के अलावा , ्िेत लोगों का अ्िेतों के लिए समर्थन , राजनैतिक इचछाशक्त और शिक्ा-दीक्ा
इन सब की वजह से जो मानसिकता बदली है । कुछ कमियों के बावजूद उस बदली मानसिकता का प्रतिबिंब , सिनेमा और समाज का एकदूसरे की जवाबदेही में दिखता है ।
हमारे यहाँ जो भी दलित केंद्रित फिलमें इस दौर में बनी हैं या तो उसमें से कई किरदार फिलम की कहानी का एक हिससा मात् है या किसी घटिना पर केंद्रित हैं , नहीं तो गौण रूप से मौजूद हैं । लेकिन अगर हम प्रभाव क्ेत् की बात करें तो दलित किरदारों का वह प्रभाव उस तरह से देखने को नहीं मिलता है , जो कि काले लोगों पर केंद्रित सिनेमा में देखने को मिलता है । जबकि अ्िेत लोगों को कायदे से बहुत सारे अधिकार जिसमें से वोटि देने का अधिकार भी है 70 के दशक के आसपास मिला । जबकि हिंदुसतान 1947 में आजाद हो गया और 1950 में हमारा गणतंत् भी लागू हो गया । बराबरी का , दलितों से बाद मिले अधिकार के बावजूद काले लोग सामाजिक नरार में हिंदुसतान की तुलना में काफी आगे रहे , जबकि हमारे यहाँ सवर्ण मानसिकता की बाधा के वजह से सामाजिक नरार का प्रीतिनिधिति रेंग-रेंग कर बढ़ रहा है । दूसरी ओर सवर्ण समाज का जाति की मानसिकता , जो
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