राजनीतिक दल एवं दलित नेताओं द्ारा किये गए गठजोड़ दलित हित में नहीं बशलक वरश्तगत लाभ के लिए किये जाते रहे हैं । दलित नेता अ्सर यह कहते हैं कि डलॉ . आंबेडकर ने भी कांग्रेस तथा अनर पामटि्डरों के साथ गठजोड़ किये थे । लेकिन वह यह भूल जाते हैं कि डलॉ आंबेडकर ने यह गठजोड़ दलित हित में किये थे न के
वरश्तगत लाभ के लिए । कांग्रेस के साथ वह संविधान बनाने के लिए जुड़े थे ्रोंकि वह संविधान में दलितों को उनका हक़ दिलाना चिाहते थे । उनहोंने प्रथम चिुनाव में दूसरी पामटि्डरों के साथ गठजोड़ विचिारधारा और एजेंडे की समानता के आधार पर ही किया था ।
वासति में यदि देखा जाएं तो वर्तमान दलित राजनीति मुद्ामिहीनता का शिकार है । यह तो दलित राजनीति का दिवालियापन है जिसका न तो कोई दलित एजेंडा है और न ही कोई रा्ट्ीर
एजेंडा । इसीलिए दलित राजनीति न केवल दिशाविहीन है , बशलक इसी कारण दलित नेता अपनी मनमजटी करने में सफल हो जा रहे हैं । एजेंडा बनाने से नेता उससे बंध जाता है और उससे मुकर जाने पर उसकी जवाबदेही हो सकती है । इसीलिये दलित नेता अपने वोटिरों से बिना कोई वादा किये डलॉ आंबेडकर और जाति के नाम पर वोटि लेते हैं । दलित पामटि्डरों द्ारा कोई भी एजंडा घोषित न करने के कारण दूसरी पामटि्डरां भी अपना कोई दलित एजेंडा नहीं बनाती हैं और इतना बड़ा दलित समुदाय रा्ट्ीर राजनीति में केवल वोटिर होकर रह गया है । उसके मुद्े रा्ट्ीर राजनीति का केंद्र बिंदु नहीं बनते । यह वर्तमान दलित राजनीति की सबसे बड़ी विफलता है ।
वर्तमान दलित राजनीति पहचिान की राजनीति की दलदल में फंसी हुयी है । दलित नेता अपनी राजनीति दलित मुद्ों को लेकर नहीं बशलक जाति समीकरणों को लेकर करते हैं । वह यह तो अपनी-अपनी उपजाति के वोटिरों को जाति के नाम पर लुभाते हैं या फिर डलॉ . आंबेडकर के नाम को भुनाते हैं । मायावती तो दलितों पर अपना एकाधिकार जताती है . वह यह बात भी बहुत अधिकारपूर्ण ढंग से कहती है कि उस का वोटि हसतानतरणीय है , जैसे कि दलित वोटिर उस की भेढ़ बकरियां हों , जिनहें वह जिस मंडी में चिाहे , मनचिाहे दाम में बेचि सकती है । यही कारण है कि मायावती का दलित आधार बहुत हद तक खिसक गया है । एक बार बाबा साहेब ने बातचिीत के दौरान कहा था ,” मेरे विरोधी मेरे विरुद्ध तमाम आरोप लगाते रहे हैं परनतु मेरे ऊपर कोई भी दो आरोप नहीं लगा सका . एक मेरे चिररत् के बारे में और दूसरा मेरी ईमानदारी के बारे में .” आज कितने दलित नेता इस प्रकार का दावा कर सकते हैं ? मायावती का भ्रष्टाचार तो खुली किताब है । सर्वविदित है कि भ्रष्टाचार जनविरोधी होता है और उसका सबसे अधिक खामियाजा गरीब लोगों को भुगतना पड़ता है । मायावती के भ्रष्टाचार का खामियाजा उत्र प्रदेश के दलितों को भुगतना पड़ा , जिसकी भरपाई अब भाजपा
सरकार कर रही है ।
वर्तमान दलित राजनीति की जो कमियां , कमजोरियां , भटिकाव और उलझनें दृष्टिगोचिर हुयी हैं उनके परिपेक्र में एक नए विकलप की ज़रुरत है जो परमपरागत सत्ा की राजनीति की जगह वरिसथा परिवर्तन की पक्धर हो । वर्तमान दलित पामटि्डरां एक वरश्त आधारित पामटि्डरा हैं जो उनकी वरश्तगत जागीर हैं जिसका इसतेमाल एक वरापारिक घराने की तरह किया जाता है । इनके अधरक् ही इनके सिचेसर्वा हैं और उनके अलावा पार्टी में किसी दूसरे नेता का कोई अशसतति नहीं है । डलॉ . आंबेडकर द्ारा सथामपत पामटि्डरों की एक ख़ास विशेषता यह थी कि इनमें सामूहिक नेतृत्ि और अंदरूनी लोकतंत् का विशेष प्रावधान था । वरश्त पूजा के लिए कोई सथान नहीं था । बाबा साहब ने कहा था कि जातिविहीन एवं वर्गविहीन समाज की सथापना हमारा रा्ट्ीर लक्र है । उन का यह भी निश्चित मत था कि जाति उनमूलन किये बिना न केवल दलितों बशलक समपूण्य हिनदू समाज की मुक्त संभव नहीं है । . 1952 में शैड्ुलड कास्टस फेडेरशन के संविधान में राजनीतिक पार्टी की भूमिका की वराखरा करते हुए डलॉ . आंबेडकर ने कहा था , “ राजनैतिक पार्टी का काम केवल चिुनाव जीतना ही नहीं होता , बशलक यह लोगों को मशमक्त करने , उद्ेमलत करने और संगठित करने का होता है .” इसी प्रकार दलित नेता के गुणों का बखान करते हुए उनहोंने कहा था , “ आपके नेता का साहस और बुद्धिमत्ा किसी भी पार्टी के सिवोच्च नेता से कम नहीं होनी चिाहिए . दक् नेताओं के बिना पार्टी ख़तम हो जाती है ”। इसके विपरीत यह देखा गया है कि वर्तमान दलित पामटि्डराँ दलितों को मशमक्त करने , उद्ेमलत करने और संगठित करने की बजाये उनका इसतेमाल केवल जाति वोटि बैंक के रूप में करती हैं । इसी तरह वर्तमान दलित नेताओं का कद् और बुद्धिमत्ा डलॉ . आंबेडकर के मापदंडों से कोसों दूर हैं । अतः दलित पार्टी की राजनीतिक और सामाजिक भूमिका बहुत सप्टि होनी चिाहिए और उन के नेता सुयोगर होने चिाहिए ।
( साभार ) ekpZ 2021 Qd » f ° f AfaQû » f ³ f ´ fdÂfIYf 19