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नहीं होते हैं । ल्व्वाह में तो शराब अलन्वा्य्ष है । बरीमाररी पर दे्वरी-दे्वताओं को तर्पण करने के लिए, जादू-टोने के प्रभा्व से मुसकत हेतु आतमाओं करी संतुसषट के लिए दे्व-बड्वा( दे्वों करी सामूहिक पूजा) के अ्वसर पर शराब का प्र्योग लक्या जाता है । शराब के अतिरिकत नशे के लिए भरील ताडरी भरी परीते हैं । भरील धूम्रपान के भरी शौकरीन होते हैं । भरील जनजरी्वन में धूम्रपान का महत्वपूर्ण सथान है । अतिथि को बरीडरी पिलाना इनके समाज में आतिथ्य का सूचक है ।
भरील जनजाति करी ्वेशभूषा अत्यंत साधारण है, इनमें दिखा्वा नाम-मात् का भरी नहीं होता । भरील पुरुषों करी दैनंदिन ्वेशभूषा मात् एक लंगोटरी है तथा सिर पर फेंटा बांधने का प्रचलन भरी है । निर्धन भरील ्वसतुतः फेंटा न बांध कर एक मरीटर लंबा और एक फुट चौड़ा कपड़े का टुकड़ा लेकर सिर पर लपेट लेते हैं । उनकरी इस ्वेशभूषा का प्रत्यक्ष संबंध आर्थिक ससथलत तथा बाह्य संपर्क से
है । भरील पुरुषों करी अपेक्षा भरील महिलाएं वस्त्ों के प्रति सजग होतरी हैं । भरील महिलाओं करी ्वेशभूषा में सामान्यतः लुगड़ा, ओढ़नरी, चोलरी तथा लँहगा ससममलित होता है । भरील जनजाति सामान्यतः ल्वपन्नता के कारण वस्त्ों पर अधिक व्य्य नहीं कर पाते, किंतु साज-सज्ा में ्ये ्वनों से प्रापत होने ्वाले फूलों-पत्तियों को श्ृंगार साधन बनाते हैं । ल्वशेष अ्वसरों पर ्यह चांदरी के आभूषणों को धारण करते हैं ।
भरील जनजाति करी लोक संस्कृति में लचत्ांकन करी परंपरा अत्यंत महत्वपूर्ण है । भरील सत्री-पुरुष शररीर को अलंककृत करने के लिए आभूषणों के अतिरिकत गुदना का भरी प्र्योग करते हैं । गुदना कतिप्य जनजालत्यों में जातरी्य प्रतरीक भरी होता है । उदाहरणस्वरूप भरील महिलाओं के द्ारा आंखों के सिरों पर दो आडरी लकरीरें गुद्वाना भरील होने का प्रतरीक है । इतना हरी नहीं ्यलद किसरी सत्री के शररीर पर गुदना न गुदा हो तो उस सत्री के हाथ
का पानरी तक परीना ्वलज्षत होता है । ्वास्तव में गुदना गुद्वाने करी प्रेरणा आलद्वालस्यों को आदिमान्वों द्ारा उत्कीर्ण गुहा-चित्ों से मिलरी है । अतः आलद्वासरी समाज में माथे से लेकर पैर करी उँगलल्यों तक अनेक प्रकार का लचत्ांकन गुदना के अंतर्गत लक्या जाता रहा है, किंतु आज इस समाज करी लोक परंपरा समासपत करी कगार पर आ खडरी हुई है ।
प्रककृलत के साथ अंतलक्क्या करते हुए हरी मान्व ने कं्ठ और ्वाद्य संगरीत का ल्वकास लक्या है, जिसमें भरील जनजाति का ल्वशेष महत्व है । ढोल ्या मांदल और बाँसुररी करी धुन पर भरील इतना मधुर गाते हैं कि मन मुगध हो उ्ठता है । भरीलों के ्वाद्य ्यंत्ों में थालरी भरी शामिल है । नगाड़े का छोटा प्रारूप भरी ्वे गले में लटकाकर हाट मेलों में गाते-बजाते हुए देखे जाते हैं । अतः भरील जनजाति के सांस्कृतिक धरोहरों में गरीत-संगरीत सर्वोपरि है । इसके गा्यन द्ारा शासबदक लचत्ण
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