भील जनजाति की लोक- सांस्कृतिक चेतना
संधया पांडेय
रत अनेक जालत्यों-जनजालत्यों,
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धर्म पंथों तथा संस्कृति संप्रदा्यों
का भंडार है । हमाररी भारतरी्य सामाजिक व्य्वसथा में जनजालत्यों का अत्यंत महत्वपूर्ण सथान है । जनजाति, जिनहें हम
्वन्वासरी, आलद्वासरी ए्वं भूमिजन के नाम से जानते हैं, भारत के ल्वलभन्न प्रांतों में लन्वास करतरी हैं । नगर से दूर ्वन्य प्रदेशों और बरीहड़ जंगलों में प्राककृलतक जरी्वन व्यतरीत करने ्वालरी इन आदिम जालत्यों करी लोक-संस्कृति में धरतरी करी सोंधरी खुशबू प्राककृलतक ्वाता्वरण में पल्लवित
और पुसषपत होतरी है । ्वास्तव में ्ये ्वन्वासरी ्वन-पुत् हैं । गिलिन और गिलिन ने अपनरी रचना ' कलचरल एंथ्ोपोललॉजरी ' में जनजाति को परिभाषित करते हुए लिखा है कि सथानरी्य जनजातरी्य समूहों का ऐसा सम्वा्य जनजाति कहा जाता है जो एक सामान्य क्षेत् में लन्वास
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