eMag_Feb 2021_Dalit Andolan | страница 7

अछवुि प्रयोग था , जिसका मानव धर्म और समाज पर अमिट प्रभाव पड़ता है ।
देखा जाये तो संत रैदास का जीवन और कावय उदात मानवता के लिए आवशयक सदाचारों के शाशवि सैद्धांतिक मू्यों का अक्षय भंडार है , जिसमें से प्रतयेक वर्ग और ससथति तथा मानसिक सिर पर वयसकि अपने लिए सु ंदर-सुंदर मोतियों का चुनाव सुगमता से कर सकता है । उनहोंने हिंदू समाज में भावातमक एकता सथातपि करने का प्रयास किए । छुआछूत तथा वर्ण वयवसथा का विरोध करने के साथ ही उनहोंने ' जीवहतया ' को पाप घोषित कर मांसाहारी जैसी प्रवृत्ति को समापि करने का प्रयास किया तथा अहिंसा के वैदिक सिद्धांत का प्रचार किया । वह मानव मात् को पूजा के साथ-साथ श्म के प्रति आसथा का भी उपदेश देते हैं । उनहोंने ततकािीन समाज
में वयापि सामाजिक , आर्थिक और राजनीतिक शोषण के खिलाफ आवाज उठाई और एक ऐसे समाज की क्पना की थी जिसमें ये सब विषमता न हों ।
संत रैदास केवल वाणी में आधयासतमक विकास नहीं करते थे , बल्क जो कहना होता था , उसे सवयं ही करने लगते थे । सामाजिक मानयिाओं का सनातनी सवरूप उनहें सवीकार्य था , किनिु उनमें थोपी गयी किसी भी अनावशयक पदधयति को वह नहीं सवीकार करते थे । उनहोंने सप्ट कहा था कि समाज के कर्म के आधार पर अथवा जनम के आधार पर अथवा किसी भी आधार पर उतपन्न की गयी सामाजिक विषमता हिनदू धर्म को संगठित करने के लिए सबसे बड़ी बाधा हो सकती है । इसलिए भेदभाव निर्मूलक और सामाजिक विषमता निरोधक परिससथतियों को उतपन्न करने की आवशयकता है ।
विशव की किसी भी संसकृति से हिनदू संसकृति को एकमत से सर्वश्े्ठ सवीकार किया जा चुका है कि सनातन एवं सार्वभौमिक होने के कारन यह विशव के सभी लोगों के लिए वयावहारिक एवं सुग्ाह्य है । संत रैदास ने इसी विशेषता के समाज का आह्ाहन किया था कि समपूण्ष समाज हिनदू संसकृति का पालन करे और आपने आचार-वयवहार , मर्यादित कर्तवयों के माधयम से सामाजिक समरसता के वातावरण को निर्मित करे । संत रैदास ने आम लोगों को हिनदू संसकृति के गूढ़ रेशयो को समझाया और कहा कि यह हिनदुसथान में रहने वाले लोगों के लिए जीवन का सबसे बड़ा उपहार है , परनिु इसको प्रापि करने के लिए जितनी अच्ी सोच किसी हिनदू में हो सकती है , उतनी किसी अनय में नहीं हो सकती है । इसलिए हिनदू समाज को चाहिए कि वह किसी अनय से इसके लिए अपेक्षा न करे और किसी अनय पर इसे थोपने का भी प्रयास न करे । जो लोग इसकी विशेषता को समझ लगे , वह हिनदू हों या मुसलमान , स्वतः ही इसको अपना लेने हेतु तैयार हों जायेगे ।
संत रैदास ने हिनदू संसकृति के अनुपालन
करने हेतु हिनदू समाज को निरंतर अवगत कराया । उनके आह्ाहन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उनहोंने जीवन संसकृति के दोनों ही पक्षों को साथ-साथ लिया था और जितना बल आधयातम पर दिया , उतना ही भौतिक जीवन पर भी दिया । उनका कहना था कि हिनदू संसकृति के संवहन में आधयातम और भौतिक यानी दोनों का ही समाज सहयोग होता है । इसलिए किसी भी एक के सहारे मानव जीवन पूण्षितः को प्रापि नहीं कर सकता है । उनहोंने सवयं ही हिनदू संसकृति के इन दोनों आयामों को आतमसात करके अपने अनुयायियों का भी मार्ग प्रशसि किया । उनहोंने इस भरम का खंडन किया कि धर्म का समबनध किसी विशेष जाति या मानव से है । उनहोंने सनदेश दिया था कि समपूण्ष विशव एक ही समाज का दूसरा नाम है और सभी समाज में केवल मानव धर्म को मानने वाले रहते है । जो मानव समाज को मिटाने में लगे हैं , उनको मानव श्ेणी में रखना और उनको सामाजिक मानना गलत हैं । बल के घमंड में जब भी मानव समाज को मिटाने का कार्य हुआ , ऐसा करने वाले केवल राक्षस ही कहे गए थे ।
संत रैदास का कहना था कि समाज का वह सवरूप कभी नहीं रहा , जहां मानवता के संहारक निवास करते हों , बल्क समाज का सवरूप तो केवल वह हैं , जहां मानव-मानव एक समान होते हैं और सभी का एक सनातन धर्म होता है , जिसमें हिंसा नहीं , बल्क करुणा और मैत्ी के भाव होते हैं । ऐसा समाज सिर्फ हिनदू समाज ही है , जिसको सनातन हिनदू समाज का आदिकाल से उपहार प्रापि है । देखा जाये तो अपने पूरे जीवन में संत रैदास ने मानव समाज के क्याणार्थ मानवतापरक हिनदू जीवन पदद्ति एवं संसकृति का खुलकर प्रचार किया और एक महान हिनदू संत के रूप में सदैव मर्यादित भी हुए ।
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