eMag_Feb 2021_Dalit Andolan | Page 5

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हिन्दू धर्म-संस्कृ प्त के ध्वजवाहक संत रैदास

धयकाल में मुससिम आक्रांताओं ने

अतयाचार और दमन से जब हिनदू
समाज अपने अससितव की लड़ाई लड़ रहा था । ससथति यह थी कि हिनदू समाज के सामने इसिाम का सवीकार करने अथवा मृतयु को प्रापि करने के अलावा कोई अनय रासिा नहीं था । ऐसे विपरीत समय में कई हिनदू धर्मरक्षको का आविर्भाव हुआ । संत रैदास , जिनहें संत गुरु रविदास भी कहा जाता है , उनमें से एक थे । संत रविदास की वासितवक जनमतिथि की जानकारी अन्तः-वाह्य साक्यों के आधार पर किया जाता है । जानकारी के अनुसार उनका जनम समवि 1433 वि . के माघ मास की पूर्णिमा के रविवार दिन हुआ
था । रविवार का दिन सूर्य से समबंतधि होने के कारन बड़े महत्व का माना जाता है । सूर्य की अरुण शैशवावसथा जितनी भी प्रियकर होती है , उसकी प्रौढ़ावसथा उतनी ही प्रखर और असहाय होने लगती है । रविवार के दिन ऐसे महातमा का जनम लेना यह भी इंगित करता है कि वह अरुण सूर्य की तरह प्रिय थे और दृढ़व्रती संत के रूप में सूर्य की प्रखर जयोति भी थे । कुछ लोग रविवार को जनम लेने के आधार पर उनको रविदास भी कहते है , लेकिन वस्तुतः वह रय अथवा रै अर्थात ईशवर के दास थे ।
संत रैदास का जनम काशी अर्थात वाराणसी के मंडेसर अथवा वर्तमान के मंडुआडीह के
भिटवा नामक एक हिनदू चर्मकार जाति की बसिी में ससथि एक इमली के पेड़ के नीचे हुआ था और कालांतर में उसी वृक्ष के नीचे बैठकर उनहोंने अपनी साधना की थी । वर्तमान में यह सथान वासितवक रूप से काशी की पंचकोशी परिक्रमा के अंतर्गत है । गुरु रैदास का जीवन आधयासतमक ऋषियों एवं हिनदू संसकृति के संवाहक संतों के जीवन में घटित उदहारण से संयुकि मिलता है । उनके पितामह हरिनंदन को धौलागढ़ जंगल में सननदन ऋषि के आशीर्वाद से पुत् रत्न की प्रासपि हुई थी , जिसका नाम रगघू रखा गया । जिस प्रकार राजा रघु के कुल में भगवान् श्ीराम का जनम हुआ था , उसी प्रकार रगघू के कुल में संत रैदास ने
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