eMag_Feb 2021_Dalit Andolan | Page 3

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कोरोना , स्वयंभू किसान और बजट

दशक का अंतिम वर्ष अज्ाि बीमारी कोरोना महामारी

दूसरे

की भेंट चढ़ गया । कोरोना से निपटने के लिए प्रधानमंत्ी
नरेंद्र मोदी के नेतृतव में हरसंभव प्रभावी प्रयास किए गए , जिससे भारत में कोरोना संक्रमण के प्रसार को रोकने में मदद मिली , साथ ही वैज्ातनकों ने दो सवदेशी वैकसीन का निर्माण कर सिर्फ भारत में ही नहीं , वरन विशव मानव समाज में आशा की नयी किरण पैदा कर दी । वैकसीन अभी लोगों तक पहुंच भी नहीं पाई , मुससिम समाज में बहस प्रारमभ हो गयी कि वैकसीन में उपयोग किए जा रहे रसायन या सामग्ी ' हलाल ' श्ेणी की है या ' हराम '? मुससिम समाज ने सिर्फ भारत में ही नहीं , बल्क तरिटेन , अमेरिका , यूरोप के कई देशों में कोरोना से निदान के लिए विकसित किये गए जीवनरक्षक टीके में ' हलाल ' खोजने के लिए जिस तरह की प्रतिक्रिया वयकि की , वह अच्ा संकेत नहीं है । ' हलाल ' और ' हराम ' की मजहबी वयाखया के माधयम से पूरे विशव में एक ऐसे सुनियोजित तंत् को खड़ा कर दिया गया है , जो ' हलाल ' की आड़ में सिर्फ मजहबी धार्मिक , सामाजिक , राजनीतिक और आर्थिक हितों को पूरा कर रहा है ।
' हलाल तंत् ' ने भारत में भी अपने पैर जमा लिए हैं और इसके नकारातमक परिणाम जमीनी सिर पर देखे जा रहे हैं । सिर्फ धर्म विशेष की आसथा को पोषित करने के लिए ' हलाल तंत् ' को समूचे गैर मुससिम वर्ग-समाज पर थोप देना , कहीं से भी उचित नहीं ठहराया जा सकता हैं । " हलाल तंत् " को सैकड़ों वरषों से चले आ रहे धर्म युद्ध का आधुनिक सवरूप भी कहा जा सकता है , जिसका एकमात् लक्य मजहबी हितों को सुरक्षित करना है । प्रधानमंत्ी नरेंद्र मोदी के नेतृतव वाली केंद्र सरकार के केंद्रीय वाणिजय एवं उद्ोग मंत्ािय ने ' हलाल ' पर अंकुश लगाने के लिए कार्य प्रारमभ कर दिया है और मांस निर्यात में ' हलाल ' की बाधयिा को समापि करके खटिक वर्ग के लाखों लोगों को राहत दी है ।
कई दशकों से अपने समग् विकास का इंतजार करने वाले दलित वर्ग को जिस प्रकार से मोदी सरकार ने अपनी प्राथमिकताओं
में रखा , उसका प्रभाव नगरों से लेकर ग्ामीण क्षेत्ों में रहने वाली दलित जनता के मधय जाकर देखा-समझा जा सकता है । पिछले छह वर्ष के दौरान मोदी सरकार की जिन योजनाओं ने दलित समाज के समग् विकास को गति दी है , उनमें कृषि सुधार के लिए लागू किए तीन कृषि क़ानून भी शामिल हैं । देश में कृषि क्षेत् से लगभग साथ प्रतिशत जनता जुडी हुई हैं , जिसमें दलित , पिछड़े , गरीब और वंचित वर्ग की जनता का प्रतिशत अधिक है , जो भूमिहीन है और कृषि कायषों के माधयम से जीवनयापन करता है । कृषि कानूनों के माधयम से कृषि क्षेत् में वयापक और आमूलचूल परिवर्तन करके मोदी सरकार का लक्य किसानों , कृषि श्तमकों एवं कृषि पर निर्भर सभी लोगों की आय में इस तरह से बढ़ोत्तरी करना है , जिससे वह भी अपने घर-परिवार के साथ संतुष्टपूर्वक जीवनयापन करने में सक्षम हो । कृषकों को बाजार का सीधा लाभ देने , उनकी आय को बढ़ाने और उनहें सविंत्िापूर्वक कृषि कार्य करने की दृष्ट से लाये गए कृषि कानूनों से बाजार के उन सवयंभू किसानों पर नकारातमक प्रभाव होगा जो मंडियों में बैठकर कृषकों को आने-पौने दाम देकर कृषि उतपादों पर मोटा लाभ कमाते आ रहे थे ।
कृषि कानूनों के विरुद्ध तद्िी में सड़कों पर बैठे सवयंभू किसान यह दबाव बनाने की चे्टा कर रहे हैं कि केंद्र सरकार कृषि कानूनों को रद्द कर दे । किसानों की आड़ में और विपक्षी दलों की शह पर रा्ट्रविरोधी ततवों ने ऐतिहासिक लालकिला और तद्िी की सड़कों पर किस तरह से अराजकता फैलाई गयी , वह सभी ने देखा । सवयंभू किसानों की मांग को सिरे से ख़ारिज करने वाली केंद्र सरकार ने अपने बजट-21 के माधयम से सनदेश दे दिया है कि प्रगति और आतमतनभ्षरता की ओर बढ़ते कदमों की गति को अब कोई रोक नहीं सकता है । बजट में भावी भारत की उस तसवीर की झलक देखी जा सकती है , जो भारत दलित , पिछड़े , गरीब और वंचित वर्ग की जनता को अपने में समेटे समग् विकास की राह तक रहा है ।
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