August 2026_DA | Page 49

मुद्ा

यह दिखाया गया कि सभी सवर््ण जातिवादी है और दवलतों पर हज़ारों िषषों सबे अत्याचार करतबे आयबे है । जातिवाद को स्बसबे अधिक ब्ाह्मणोों नबे ्बढ़ावा दिया है । जातिवाद की इस विष लता को खाद दबेनबे के लिए ब्ाह्मर्िाद का जुमेला प्रचलित किया गया । दबेश के इतिहास मेें मेध्य काल का एक अंधकारमेय युग भी थीा, ज्ब वर््णव्यि्लथीा का ्लथीान जातिवाद नबे लबे लिया थीा । कोई व्यक््तत ब्ाह्मर् गुर्, कर््म और ्लिभाव के ्लथीान पर नहीं, अपितु जन््म के ्लथीान पर प्रचलित किया गया । इससबे पूर््व वैदिक काल मेें किसी भी व्यक््तत का वर््ण, उसकी शिक्ा प्राक्प्त के उपरांत उसके गुणोों के आधार पर वनधारारित होता थीा । इस व्बगाड़ व्यि्लथीा मेें एक ब्ाह्मर् का ्बबेर्ा ब्ाह्मर् कहलानबे लगा चाहबे वह अनपढ़, मेुखरा, चरित्रहीन ्तयों न हो और एक शुद्र का ्बबेर्ा केवल इसलिए शुद्र कहलानबे लगा ्तयोंकि उसका पिता
शुद्र थीा । वह चाहबे कितना भी गुर्िान ्तयों न हो । इसी काल मेें सृष््टटि के आदि मेें प्रथीमे संविधानकतारा मेनु द्ारा वनधारारित मेनु्लमेृवत मेें जातिवादी लोगों द्ारा जातिवाद के समेथीरान मेें वमेलािर् कर दी गई । इस वमेलािर् का मेुख्य उद्देश््य मेनु्लमेृवत सबे जातिवाद को ्लिीकृत कराना थीा । इससबे न केवल समेाज मेें नया नकारात््मक दौर प्रारम्भ हो गया और सामेाजिक एकता भंग हो गई । ्लिामेी दयानंद द्ारा आधुनिक इतिहास मेें इस घोर्ालबे को उजागर किया गया । ईसाई वमेशनरी की तो जैसबे मेन की मेुराद पपूरी हो गई । दवलतों को भड़कानबे के लिए उन्हें मेसाला वमेल गया । मेनुवाद जैसी जुमेलबे प्रचलित किए गए । मेनु मेहवषरा को उस वमेलािर् के लिए गालियां दी गई जो उनकी रचना नहीं थीी । इस वैचारिक प्रदपूषर् का उद्देश््य हर प्राचीन गौरवशाली इतिहास और उससबे सम््बंवधत तथ्यों के प्रति जहर भरना थीा । इस
नकारात््मक प्रचार के प्रभाव सबे दलित समेाज न केवल हिन्दपू समेाज सबे वचढ़नबे लगबे अपितु उनका ्बड़़े पैमेानबे पर ईसाई धमेारान्तरर् करनबे मेें सफल भी रहबे ।
इन्तिास के सा्थ खिलवाड़
इस चरर् मेें ्बुद्ध मेत का नामे लबेकर ईसाई वमेशनररयों द्ारा दवलतों को ्बरगलाया गया । भारतीय इतिहास मेें ्बुद्ध मेत के अ्लत काल मेें तीन व्यक््ततयों का नामे ्बबेहद प्रसिद्द रहा है । आदि शंकराचायरा, कुमेारिल भट् और पुष््यमित्र शुंग । इन तीनों का कायरा उस काल मेें दबेश, धर््म और जाति की परिस््थथिति के अनुसार मेहान तप वाला थीा । जहां एक ओर आदि शंकराचायरा नबे पाखंड, अन्धवि्चिास, तंत्र-मेंत्र, व्यवभचार की दीमेक सबे जजरार हुए ्बुद्ध मेत को प्राचीन शास्त्रार््थ
ईसाई मिशनरी ने हिन्ददू समाज से सम्बंनि्त त्ययोहारों कयो भी नकारात्मक प्रकार से प्रचारर्त करने का एक नया प्रपंच किया । इस खेल के पीछ़े का इन्तिास भी जानिए । ियो दनल्त ईसाई बन जा्ते ्थे, वह अपने रीन्त-रिवाज, अपने त्ययोहार मनाना ििीं छयोड़्ते ्थे । उनके मन में प्राचीन िम्ष के नवर्य में आस््था और श्रद्ा िम्ष परिवर््तन करने के बाद भी जीनव्त रि्ती ्थी ।
शैली मेें परा्लत कर वैदिक धर््म की ्लथीापना की, िहीं कुमेारिल भट् द्ारा मेाध््यम काल के घनघोर अंधबेरबे मेें वैदिक धर््म के पुनरुद्धार का संक्कप लिया गया । यह कायरा एक समेाज सुधार के समेान थीा । ्बुद्ध मेत सदाचार, संयमे, तप और संघ के सन्दबेश को छोड़कर मेांसाहार, व्यवभचार, अन्धवि्चिास का प्रायः ्बन चुका थीा । यह दोनों प्रयास शास्त्रीय थीा तो तीसरा प्रयास राजनीतिक थीा । पुष््यमित्र शुंग मेगध राज्य का सबेनापति थीा । वह मेहान राष्ट्भ्तत और दपूरदृष््टटि वाला सबेनानी थीा । उस काल मेें सम्राट अशोक का वंशज ्बृहदरथी राजगद्दी पर ्बैठा थीा । पुष््यमित्र नबे उसबे अनबेक ्बार आगाह किया थीा कि दबेश की सीमेा पर ्बसबे ्बुद्ध विहारों मेें विदबेशी ग्ीक सैनिक ्बुद्ध भिक्ु ्बनकर जासपूसी कर दबेश को तोड़नबे की योजना ्बना रहबे है । उस पर तुरंत कायरािाही करबे । मेगर ऐशो आरामे मेें मस््त ्बृहदरथी
नबे पुष््यमित्र की ्बात पर कोई ध्यान नहीं दिया । विवश होकर पुष््यमित्र नबे सबेना के निरीक्षण के समेय ्बृहदरथी को मेौत के घार् उतार दिया । इसके प्चचात पुष््यमित्र नबे ्बुद्ध विहारों मेें छिपबे उग्िावदयों को पकड़नबे के लिए हमेला ्बोल दिया । ईसाई वमेशनरी पुष््यमित्र को एक खलनायक, एक हत्यारबे के रूप मेें चित्रित करतबे हैं, ज्बवक वह मेहान दबेशभ्तत थीा । अगर पुष््यमित्र ्बुद्धों सबे द्वेष करता तो उस काल का स्बसबे ्बड़ा ्बुद्ध ्लतपूप न ्बनवाता । ईसाई वमेशनररयों द्ारा आदि शंकराचायरा, कुमेारिल भट् और पुष््यमित्र को निशाना ्बनानबे के कारर् उनकी ब्ाह्मणोों के विरोध मेें दवलतों को भड़कानबे की नीति थीी । ईसाई वमेशनररयों नबे तीनों को ऐसा दशाराया जैसबे वह तीनों ब्ाह्मर् थीबे और ्बुद्धों को विरोधी थीबे । इसलिए दवलतों को ्बुद्ध होनबे के नातबे तीनों ब्ाह्मणोों का ्बवहष्कार करना चाहिए ।
हिन्ददू त्ययोहारों और देवी-देव्ताओं के नाम पर भ्ामक प्रचार
ईसाई वमेशनरी नबे हिन्दपू समेाज सबे सम््बंवधत त्योहारों को भी नकारात््मक प्रकार सबे प्रचारित करनबे का एक नया प्रपंच किया । इस खबेल के पीछ़े का इतिहास भी जानिए । जो दलित ईसाई ्बन जातबे थीबे, वह अपनबे रीति-रिवाज, अपनबे त्योहार मेनाना नहीं छोड़तबे थीबे । उनके मेन मेें प्राचीन धर््म के विषय मेें आ्लथीा और श्रद्धा धर््म पररितरान करनबे के ्बाद भी जीवित रहती थीी । अ्ब उनको कट्र ्बनानबे के लिए उनको भड़काना आि्चयक थीा । इसलिए ईसाई वमेशनररयों नबे वि्चिविद्यालयों मेें हिन्दपू त्योहारों और उनसबे सम््बंवधत दबेिी-देवतोों के विषय मेें अनगराल प्रलाप आरम्भ किया । इस षड़यंत्र का एक उदाहरर् यह भी है कि मेवहषासुर दिवस का आयोजन दवलतों के मेाध््यम सबे कुछ विक््चिद्यालयों मेें ईसाईयों नबे आरम्भ कराया । इसमेें शोध के नामे पर यह प्रसिद्द किया गया कि काली दबेिी द्ारा अपनबे सबे अधिक शक््ततशाली मेपूलनिवासी राजा के साथी नौ दिन तक पहलबे शयन किया गया । अंवतमे दिन मेवदरा के नशबे मेें दबेिी नबे शुद्र राजा मेवहषासुर का सर कार् दिया । ऐसी ्बबेहपूदी, ्बचकाना ्बातों को शौध का नामे दबेनबे वालबे ईसाईयों का उद्देश््य दशहरा, दीवाली, होली, ओर्मे, श्रािर्ी आदि पिषों को पाखंड और ईस््टर,
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