April 2026_DA | Page 49

का मत था कि दलितों के अतयािार तथा उतपीडन सहन करने तथा वर्तमान पररकसथजतयों को सनतोषपूर्ण मानकर सवीकार करने की प्वृति का अनत करने के लिए उनमें शिक्ा का प्सार आवशयक है । शिक्ा के माधयम से ही उनहें इस बात का आभास होगा कि विशव कितना प्गतिशील है तथा वह कितने जप्डछे हुए है । उनका मानना था कि दलितों को अनयाय, अपमान तथा दबाव को सहन करने के लिए मजबूर किया जाता है । वह इस बात से दुखी थे
कि दलित इस प्कार की पररकसथजतयों को बिना कुछ कहे सवीकार कर लेते हैं । वह सं्या में अधिक होने के बावजूद उतपीडन को सहन कर लेते हैं, जबकि यदि एक अकेली चींटी पर भी पैर रख दिया जाए तो वह प्जतरोध करते हुए काट डालती है । इन पररकसथजतयों को समापत करने के लिए डा. आंबेडकर दलितों में शिक्ा के प्सार को बहुत महतवपूर्ण मानते थे । उनहें केवल औपचारिक शिक्ा ही नहीं अपितु अनौपचारिक शिक्ा भी दी जानी चाहिए ।
डा. आंबेडकर का मानना था दलित वर्ग को अपने हितों की रक्ा के लिए विधायी कायषों को अपने पक् में प्भावित करने के लिएं राजनीतिक सत्ा में पर्यापत प्जतजनजधतव मिलना चाहिए । अत: उनका सुझाव था कि केनद्रीय तथा प्ानतीय विधान मंडलों में दलितों की भागीदारी हेतु पर्यापत प्जतजनजधतव के लिए कानून बनाया जाना चाहिए । इसी प्कार उनका मानना था कि निर्वाचन कानून बनाकर यह वयवसथा की जानी चाहिए कि प्थम दस वर्ष तक दलित वर्ग के वयसक मताधिकारियों द्ारा पृथक निर्वाचन के माधयम से अपने प्जतजनजध का निर्वाचन किया जाना चाहिए तथा बाद में दलित वर्ग हेतु आरजक्त सथानों पर समबकनधत निर्वाचन क्ेत्र के सभी वयसक मताधिकारियों द्ारा निर्वाचन किया जाना चाहिए ।
डा. आंबेडकर का मत था कि दलित वर्ग के उतथान के लिए यह भी आवशयक है कि उनहें सरकारी सेवाओं में पर्यापत प्जतजनजधतव दिया जाना चाहिए । उनके अनुसार इसके लिए दलित वर्ग हेतु आरक्ण की वयवसथा की जानी चाहिए । उनके अनुसार दलित वर्ग को सेवाओं में पर्यापत सथान दिलाए जाने के लिए सरकार को विशेष संवैधानिक तथा कानूनी प्ावधान करने चाहिए । डा. आंबेडकर का मानना था कि दलित वर्ग को नीति निर्माण के कायषों में उचित अवसर के लिए मंत्रिमणिलों में भी पर्यापत प्जतजनजधतव मिलना चाहिए । उनको भय था कि बहुमत के शासन में दलित वर्ग के हितों तथा अधिकारों की उपेक्ा होने की संभावना हो सकती है । किनतु यदि दलित वर्ग को कार्यपालिका में जब पर्यापत प्जतजनजधतव मिलेगा तो वह अपने अधिकारों तथा
हितों के प्जत होने वाली उपेक्ा को समापत करने में सक्म होगा तथा अपने विकास के लिए विशेष नीतियों का निर्माण कर रचनातमक काय्मरिमों को शासन के माधयम से सफलतापूर्वक जरियाकनवत किया जा सकता है ।
डा. आंबेडकर भारतीय समाज में कसत्रयों की हीन दशा से काफी क्ुबध थे । उनहोंने उस साहितय की कटु आलोचना की जिसमें कसत्रयों के प्जत भेद-भाव का दृष्टिकोण अपनाया गया । उनहोंने दलितों के उतथान एवं प्गति के लिए भी नारी समाज का उतथान आवशयक माना । उनका मानना था कि कसत्रयों के सममानपूर्वक तथा सवतंत्र जीवन के लिए शिक्ा बहुत महतवपूर्ण है । डा. आंबेडकर ने हमेशा सत्री-पुरूष समानता का वयापक समर्थन किया । यही कारण है कि उनहोंने सवतंत्र भारत के प्थम विधिमंत्री रहते हुए‘ हिंदू कोड बिल’ संसद में प्सतुत करते समय हिनदू कसत्रयों के लिए नयाय सममत वयवसथा बनाने के लिए इस विधेयक में वयापक प्ावधान रखे । भारतीय संविधान के निर्माण के समय में भी उनहोंने सत्री-पुरूष समानता को संवैधानिक दर्जा प्दान करवाने के गमभीर प्यास किए ।
डा. आंबेडकर के सामाजिक चिनतन में असपृशयों, दलितों तथा शोषित वर्ग के उतथान के लिए काफी दर्शन झलकता है । वह उनके उतथान के माधयम से एक ऐसा आदर्श समाज सथाजपत करना चाहते थे जिसमें समानता, सवतंत्रता तथा भ्ातृतव के ततव समाज के आधारभूत सिद्धांत हों । डा. आंबेडकर एक महान सुधारक थे जिनहोंने ततकालीन भारतीय समाज में प्िजलत अनयायपूर्ण वयवसथा में परिवर्तन तथा सामाजिक नयाय की सथापना के जबरदसत प्यास किए । उनहोंने दलितों, पिछड़ों, असपृशयों के विरूद्ध सदियों से हो रहे अनयाय का न केवल सैद्धांतिक रूप से विरोध किया अपितु अपने कार्य कलापों, आनदोलनों के माधयम से उनहोंने शोषित वर्ग में आतमबल तथा चेतना जागृत करने का सराहनीय प्यास किया । इस प्कार डा. आंबेडकर का जीवन समर्पित लोगों के लिए सीखने तथा प्ेरणा का नया स्ोत बन गया । �
vizSy 2026 49