April 2026_DA | Página 47

चातुर्वर्ण पदसोपानीय रूप में वगथीककृत है । जातीय आधार पर वगथीककृत इस वयवसथा को वयवहार में वयक्तयों द्ारा परिवर्तित करना असमभव है । इस वयवसथा में कार्यकुशलता की हानि होती है, ्योंकि जातीय आधार पर वयक्तयों के कायवो का पूर्व में ही निर्धारण हो जाता है । यह निर्धारण भी उनके प्जशक्ण अथवा वासतजवक क्मता के आधार पर न होकर जनम तथा माता पिता के सामाजिक सतर के आधार पर होता है । इस वयवसथा से सामाजिक सथैजतकता पैदा होती है, ्योंकि कोई भी वयक्त अपने वंशानुगत वयवसथा का अपनी सवेच्ा से परिवर्तन नहीं कर सकता । यह वयवसथा संकीर्ण प्वृतियों को जनम देती है, ्योंकि हर वयक्त अपनी जाति के अकसततव के लिए अधिक जागरूक होता है, अनय जातियों के सदसयों से अपने समबनध दृढ़ करने की कोई भावना नहीं होती है । नतीजन उनमें राष्ट्ीय
जागरूकता की भी कमी उतपन्न होती है । जाति के पास इतने अधिकार हैं कि वह अपने किसी भी सदसय से उसके नियमों की उललंघना पर दकणित या समाज से बजहष्ककृत कर सकती है ।
इस प्कार डा. आंबेडकर ने यह सपष्ि करने का प्यास किया कि जाति-वयवसथा भारतीय समाज की एक बहुत बड़ी विककृजत है, जिसके दुखभाव समाज के लिए बहुत ही घातक हैं । जाति वयवसथा के कारण लोगों में एकता की भावना का अभाव है, अत: भारतीयों का किसी एक विषय पर जनमत तैयार नहीं हो सकता । समाज कई भागों में विभ्त हो गया । उनके अनुसार जाति वयवसथा ने न केवल हिनदू समाज को दुष्प्भावित नहीं किया अपितु भारत के राजनीतिक, आर्थिक तथा नैतिक जीवन में भी जहर घोल दिया ।
डा. आंबेडकर ने हिनदू समाज में प्िजलत
असपृशयता को अनयायपूर्वक मानते हुए प्बल विरोध किया । उनहोंने विभिन्न ऐतिहासिक उदाहरणों से यह सपष्ि करने का प्यास किया कि असपृशयता के बने रहने के पी्छे कोई तार्किक, सामाजिक अथवा वयावसायिक आधार नहीं है । अत: उनहोंने इस वयवसथा का जोरदार शबदों में खंडन किया ।
डा. आंबेडकर का दृष्टिकोण था कि यदि हिनदू समाज का उतथान करना है तो असपृशयता का जड़ से निराकरण आवशयक है । डा. आंबेडकर ने असपृशयता के निराकरण के लिए केवल सैद्धांतिक दृष्टिकोण ही प्सतुत नहीं किया अपितु उनहोंने अपने विभिन्न आनदोलनों एवं कायषों से लोगों में चेतना जाग्त करने एवं इसके निराकरण के लिए विभिन्न सुझाव भी प्ेरित किए । उनहोंने असपृशयता निराकरण के लिए सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, नैतिक,
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