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प्बल समर्थक थे, लेकिन कांग्ेस इसका विरोध कर रही थी । उनहोंने संविधान सभा में कहा था,” मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि समान नागरिक संहिता का इतना विरोध ्यों हो रहा है? यह सवाल ्यों पूछा जा रहा है कि भारत जैसे देश के लिए समान नागरिक संहिता लागू करना संभव है?’’ उनहोंने कहा समान नागरिक संहिता एक ऐसा कानून होगा जो हर धर्म के लोगों के लिए समान होगा और उसका धर्म से कोई लेना-देना नहीं होगा । इस कानून में परिवार, विवाह, संपजत् और मूलभूत नागरिक अधिकार के मामलों में बराबरी होगी । राजय का यह कर्तवय होगा कि वह लोगों के वयक्तगत अधिकार को सुजनकशित करेगा और समुदाय के नाम पर उनका हनन नहीं होगा ।
अनुच्ेद-370 का प्बल विरोध
भारतीय संविधान के अनुच्छेद-370 जिसमें कशमीर को कई विशेष अधिकार दिए गए थे, उसके विरुद्ध भी डा. आंबेडकर ने काफी मुखर होकर अपने विचार रखे थे । उनहोंने अनुच्छेद-370 के बारे में शेख अबदुलला को लिखे पत्र में कहा था,” आप चाहते हैं कि भारत जममू-कशमीर की सीमा की सुरक्ा करे, यहां सडकों का निर्माण करे, अनाज की सपलाई करे साथ ही कशमीर के लोगों को भारत के लोगों के समान अधिकार मिले । आप अपनी मांगों के बाद चाहते हैं कि भारत सरकार को कशमीर में सीमित अधिकार ही मिलने चाहिए । ऐसे प्सताव को भारत के साथ विशवासघात होगा जिसे भारत का कानून मंत्री होने के नाते मैं कतई सवीकार नहीं करुंगा ।" गौरतलब है कि जिस दिन यह अनुच्छेद बहस के लिए आया था, उस दिन डा. आंबेडकर ने इस बहस में हिससा नहीं लिया ना ही उनहोंने इस अनुच्छेद से संबंधित किसी भी सवाल का जवाब दिया ।
राष्ट्रवाद की अवधारणा का समर्थन
राष्ट्ीय सवयं सेवक संघ और डा. आंबेडकर
के बीच वैचारिक सामय यह भी है कि दोनों अखंड राष्ट्वाद के पक्धर रहे । डा. आंबेडकर समपूण्म वांगमय के खंड 5 में लिखा है,” डा. आंबेडकर का दृढ़ मत था कि मैं हिंदुसतान से प्ेम करता हूं । मैं जीऊंगा तो हिंदुसतान के लिए और मरूंगा तो हिंदुसतान के लिए । मेरे शरीर का प्तयेक कण
और मेरे जीवन का प्तयेक क्ण हिंदुसतान के काम आए, इसलिए मेरा जनम हुआ है ।’’
वामपंथ का विरोध
25 नवमबर 1949 को संविधान सभा में बोलते हुआ डा. आंबेडकर ने कहा था,” वामपंथी इसलिए इस संविधान को नहीं मानेंगे ्योंकि यह संसदीय लोकतंत्र के अनुरूप है और वामपंथी संसदीय लोकतंत्र को मानते नही हैं ।’’ डा. आंबेडकर के इस एक व्तवय से यह जाहिर होता है कि डा. आंबेडकर जैसा लोकतांत्रिक समझ का वयक्ततव वामपंथियों के प्जत कितना
विरोध रखता होगा!
पंथ निरपेक्ष राष्ट्र पर समान विचार
डा. आंबेडकर का सपष्ि मत था कि भारत धर्म निरपेक् राष्ट् नहीं होगा, लेकिन कांग्ेस ने
संविधान के मूल प्सतावना में ही संशोधन कर दिया है । इसमें कांग्ेस ने धर्मनिरपेक्ता, समाजवाद और अखंडता शबद को अलग से जोड दिया । जबकि प्सतावना का मूल यह था –” हम भारत के लोग, भारत को एक समपूण्म प्भुतव-समपन्न लोकतंत्रातमक गणराजय के लिए तथा उस के समसत नागरिकों को – सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक नयाय, विचार, अभिवयक्त, विशवास, धर्म और उपासना की सवतंत्रता, प्जतष्ठा और अवसर की समता प्ापत करने के लिए तथा उन सब में वयक्त की गरिमा और राष्ट् की एकता सुजनकशित करने वाली
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