रहने वाली कुल 49 प्जतशत जनता के मुकाबले दलितों की 70 प्जतशत उस अतिदरिद्रता की हालत में रहती है । देश की कुल आबादी का 16 प्जतशत होने के बाद भी दलितों के पास कुल खेती योगय जमीन का केवल एक प्जतशत हिससा ही है । 2011 की जनगणना के अनुसार दलितों में राष्ट्ीय साक्रता दर लगभग 62 प्जतशत है । इनकी तीन-चौथाई आबादी ग्ामीण क्ेत्रों में रहती है तथा इतनी ही खेती के कायवो में लगी है । देश के बारह प्देशों में छूआछूत प्िलन में है और अनय राजयों में इसका असर कुछ कम हुआ है । देश में हर घंिछे में दो दलितों को हिंसक घटनाओं का शिकार होना पड़ता है और प्तयेक दिन दो दलितों की हतया कर दी जाती है एवं दो दलित घरों में आग लगा दी जाती है ।
20वीं सदी के दूसरे दशक से डा. आंबेडकर ने निरनतर दलित मुक्त और मानवाधिकार के मामले उठाकर सरकार व पूरे देश का धयान
आकर्षित किया । महाड़ एवं कालाराम मंदिर प्करण, गोलमेज सममेलन, पूना पै्ि, सवतंत्र मजदूर दल, अनुसूचित जाति संघ, संविधान सभा से होते हुये देश के प्थम कानून मंत्री और उससे तयागपत्र का सफर विपरीत हालात से गुजरता हुआ 14 अ्िूबर 1956 को बौद्ध धर्मानतरण के साथ ही पूर्ण हुआ । उनहोने कांग्ेस तथा महातमा गांधी की अछूतोद्धार समबनधी काय्मप्णाली की धजजियाॅ उड़ाते हुए 1945 में’’ कांग्ेस और गांधी ने अछूतों के लिए ्या किया” नामक पुसतक के प्थम पृष्ठ पर लिखा-’’ हमारा मालिक बनने से तुमहे फायदा होगा पर तुमहारा दास बनने से हमें ्या फायदा हो सकता है ।’’
प्जसद्ध इतिहासकार सुमित सरकार लिखते है कि-’’ इतिहास गवाह है कि हरिजन आनदोलन का जनम ही दलित आनदोलन को दबाने के लिए हुआ था लेकिन समय के प्वाह में दलित आनदोलन ने हरिजन आनदोलन के सामाजिक और धार्मिक प्ककृजत के मुद्ों को गौण साबित करते हुए राजनैतिक एवं आर्थिक प्जतजनजधतव के सवालों पर अपने आनदोलन की बिसात तैयार की । एक तरह से अमबेिकर के आतमसममान आनदोलन ने दलित वंचित समाज में एक चिंगारी का काम किया और इनमें राजनीतिक चेतना पैदा की ।“ सामाजिक हालात के विरोधाभास की वया्या करते हुए डा. आंबेडकर ने संविधान सभा में कहा था- भारतीय समाज में दो बातों का पूर्णतः अभाव है । इनमे से एक समानता है । सामाजिक क्ेत्र में हमारे देश का समाज वगथीककृत असमानता के सिद्धानत पर आधारित है जिसका अर्थ है कुछ लोगों के लिए उतथान एवं अनयों की अवनती । आर्थिक क्ेत्र में हम देखते है कि समाज के कुछ लोगों के पास अथाह समपजत है, जबकि दूसरी ओर असं्य लोग घोर दरिद्रता के शिकार है । 26 जनवरी 1950 को हम लोग एक विरोधाभासी जीवन में प्वेश करने जा रहे है । राजनीति के क्ेत्र में हमारे बीच समानता होगी पर अपने सामाजिक एवं आर्थिक जीवन में वर्तमान सामाजिक एवं आर्थिक संरचना के चलते एक वयक्त एक मूलय के सिद्धानत को असवीकार करना जारी रखेंगें । हम कब तक इस
विरोधाभासी जीवन को जीते रहेगें, अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में समानता को असवीकार करते रहेगें?
भारतीय समाज के निम्नतम सोपान पर जीवन यापन करने वाले समुदाय की सामाजिक आर्थिक समसयायों का जाति वयवसथा से प्तयक् समबनध है ्योंकि यहीं वयवसथा सामाजिक आर्थिक संरचना एवं संसाधनों से जुड़ी है । डा. आंबेडकर ने कहा था कि दुनिया के अनय देशों में सामाजिक रिांजतयां होती रही हैं, पर भारत में ऐसी सामाजिक रिाकनत ्यों नही हुई । इसके लिए उनहोंने जाति प्था की बुराईयों को जिममेदार माना ।
भारतीय समाज की संरचना बहुआयामी होने के साथ-साथ जटिल है । इस सामाजिक संरचना में कुछ ऐसे तत्व हैं, जो शोषित वर्ग के विरुद्ध जाते हैं । जाति प्था एक ऐसा ही तत्व है, जो सामाजिक एकता, सामाजिक समरसता और सार्थक सामाजिक सरोकारों के विरुद्ध जाता है । भारतीय समाज की धार्मिक परंपराओं में जाति- वयवसथा को जिस प्कार महिमामंडित किया गया है, उसके कारण समाज में कुछ ऐसी बद्धमूल धारणा विकसित हो गई हैं, जो सामाजिक सद्ाव में बाधक हैं । जाति-भेद के कारण समाज का एक विशेष वर्ग, जो बहुसं्यक है, वह आज के वैशवीकरण के दौर में भी असमानता, शोषण, उपेक्ा और अपमान को झेल रहा है ।
यह वर्ग आर्थिक शोषण का शिकार तो हैं ही, सामाजिक उपेक्ा और अपमान का दंश भी झेल रहा है । सपष्ि है, अभी भी दलित चिनतन को विभिन्न झंझावतों से होते हुए विकसित होना है । दलितों में यदि सवाजभमान है, मुक्त का जजबा है तो अपनी सामाजिक और आर्थिक सतर को उच्चतम सोपान तक पहुंचाने का हर संभव प्यास करेंगें । इस कार्य में मीडिया और साहितय को भी सकारातमक रुख अपनाना होगा और लोक कलयाण की अवधारणा के तहत् जनमानस में यह चेतना फैलानी होगी कि एक समता मूलक समाज और नागरिक समाज की सथापना में ही राष्ट् का हित नीहित है और जिसके फलसवरुप देश की बहुत सी समसया अपने आप दूर हो जाएगी । �
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