जन्मदिन पर विशेष
अनुसार हर तरह के श्जमकों-चाहे वह औद्योगिक हों या खेतिहर-को एक-सी सुविधाएं प्दान की जानी चाहिए, जिनमें प्ोजविेंड फंड, नियोजक का दायितव, मुआवजा, सवास्थय बीमा और पेंशन शामिल हैं ।
डा. आंबेडकर के अनुसार जाति का एक आर्थिक पक् भी है और जाजतप्था के उनमूलन के लिए, भारतीय गांवों की आर्थिक संरचना का पुनर्गठन आवशयक है । भारत की जनसं्या का लगभग 70 प्जतशत ककृजष पर निर्भर है और गांवों में रहता है, जहां जातिवाद और सांप्दायिकता का बोलबाला है । इसलिए उनहोंने संविधान सभा को संबोधित करते हुए कहा कि मेरा मानना है कि ग्ामीण गणतंत्र भारत का विनाश कर देंगे । गांव, सथानीयता की नाली और अज्ानता, संकीर्ण सोच और सांप्दायिकता के अड्ों के अलावा
्या हैं? मुझे प्सन्नता है कि संविधान के मसविदे में गांव की जगह वयक्त को इकाई बनाया गया है । उनकी यह मानयता थी कि अगर गांवों को उनकी बुराईयों से मु्त किया जाना है तो ककृजष क्ेत्र में आधुनिक परिवर्तन लाने होंगे । उनका कहना था कि गांव की वर्तमान वयवसथा न केवल जाजतप्था की पोषक है, वरन ककृजष के विकास में भी बाधक है । इसलिए ककृजष भूमि का राष्ट्ीयकरण, जाजतप्था की रीढ़ तोड देगा और ककृजष उतपादन को बढ़ावा देगा, जिससे उद्योगों के लिए‘ विपणन योगय अतिशेष’ उपलबध हो सकेगा । इसके साथ ही डा. आंबेडकर का मानना था कि बौद्धिक और सांस्कृतिक जीवन को बढ़ावा देने के लिए तेजी से औद्योगीकरण आवशयक है ।
भारत में‘ दमित वगषों’ को आर्थिक सवतंत्रता
उपलबध नहीं थी । उनके पास न तो जमीन थी, न सामाजिक हैसियत, न वयापार- वयवसाय में हिससेदारी और ना ही सरकारी नौकरियों में प्जतजनजधतव । इसलिए आंबेडकर ने उद्योग के क्ेत्र में‘ राजय समाजवाद’ की वकालत की और ककृजष भूमि पर राजय के मालिकाना हक और सामूहिक खेती पर जोर दिया । उनका यह दृढ़ मत था कि भूमिहीन श्जमकों की समसया का निदान चकबंदी या बटाईदारों को भूमि पर मालिकाना हक देने मात्र से नहीं होगा । केवल खेतों पर सामूहिक सवाजमतव से यह समसया हल हो सकती है । सामूहिक खेती का जवत्पोषण राजय द्ारा किया जाना चाहिए । राजय द्ारा खेती के लिए पानी, भारवाही पशु, उपकरण, खाद, बीज इतयाजद उपलबध कराए जाने चाहिए । राजय को खेती करने वालो से उपयु्त शुलक वसूलने
32 vizSy 2026