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भी सवामी दयाननद और उनके आर्यसमाजी आनदोलन के प्शंसक होने के साथ-साथ समालोचक भी हैं, पर उनहें आर्यनरेश द्य श्ी गायकवाड और राजर्षि शाहू की तरह आर्यसमाज आनदोलन के सहयोगियों में नहीं खडा किया जा सकता । आर्यसमाजी आनदोलन के डा. आंबेडकर हमेशा से ही हितैषी रहे हैं ।
डा. आंबेडकर के लिए सवामी दयाननद की तुलना में महातमा फुले अधिक आराधय रहे । डा. आंबेडकर ने गौतम बुद्ध, सनत कबीर और महातमा फुले की महापुरुष त्रयी को अपना गुरु माना है । संस्कृत व राष्ट्भाषा हिनदी की तरह प्ानतीय सतर पर मराठी में काम-काज न कर पाने के कारण महाराष्ट् में आर्यसमाज का आनदोलन उतना प्भावी ढंग से न चल सका जितना कि उत्र भारत में । राजर्षि शाहू महाराज के अनुसार’ रिाह्मण नौकरशाही’ के कारण महाराष्ट् में आर्यसमाज का आनदोलन प्भावी नहीं हो सका ।
डा. आंबेडकर की शिक्ा में बडौदा नरेश जी का सहयोग रहा है । इंटर पास करने के बाद डा. आंबेडकर को बी. ए., एम. ए., पी. एच, डी., डी. एस. सी.( लनदन), एल. एल. डी., बार-एट- ला, जैसी उपाधियों से विभूषित और प्काणि पकणित बनाने में आर्यसमाजी आनदोलन का, प्तयक् नहीं तो अप्तयक् रूप में, अविसमरणीय योगदान रहा है । इस बात को और कोई जाने
या न जाने सवयं डा. आंबेडकर जरूर जानते थे । इसलिए भी उनके ग्नथों में आर्यसमाजी आनदोलन के प्जत विशेष सहानुभूति नजर आती है । जहां आर्य नरेश श्ी सयाजीराव गायकवाड ने 1912 से 1915 तक डा. भीमराव आंबेडकर को उच्च विद्या-विभूषित करने के लिए शिष्यवृजत्यां प्दान कीं और उनहें अमेरिका भेजा,
वहां अपने-आपको हृदय से आर्य समाजी कहलानेवाले राजर्षि शाहू महाराज ने भी 1919 से 1922 तक आंबेडकर को विदेश जाकर अधययन करने के लिए आर्थिक दृष्टि से समपूण्म सहयोग दिया था ।
आर्यनरेश राजर्षि शाहू महाराज ने पत्रकार डा. आंबेडकर के प्थम पत्र‘ मूकनायक’ के संचालन में भी आर्थिक महायता प्दान की थी और इतना ही नहीं, 1920 में माणगांव में समपन्न प्थम असपृशयता परिषद में कोलहापुर के आर्य नरेश शाहू महाराज ने यह भविष्यवाणी भी की थी कि’ डा. आंबेडकर भारतवर्ष के अखिल भारतीय नेता होंगे ।’ ततकालीन मुमबई राजय के इन दोनों राजाओं के पास जो यह उदारमन और उदारदृष्टि थी, उसकी पृष्ठभूमि में सवामी दयाननद खड़े हुए नजर आते हैं । इन दोनों ही आर्यनरेशों के अनतःकरण पर निर्विवाद रूप से आर्यसमाजी आनदोलन की विशिष्ट छाप रही है ।
सवामी श्द्धाननद( 1856-1926) महर्षि
दयाननद के अनुयायी एवं उनकी शिक्ा पद्धति को मूर्तरूप देने वाले महापुरुष थे । दलितोद्धार एवं जातिपांति उनमूलन में उनका महतवपूर्ण योगदान है । डा. आंबेडकर, सवामी श्द्धाननद जी के कायषों से पूर्णतः परिचित थे । अपनी‘ वहाि कांग्ेस एणि गांधी हैव डन टू दि अनििेबलस’ पुसतक में उनहोंने लिखा है कि‘ सवामी श्द्धाननद दलितों के सर्वश्ेष्ठ सहायक और समर्थक थे । असपृशयता निवारण से समबकनधत( कांग्ेस की) समिति में रहकर यदि उनहें कसथरता से काम करने का अवसर मिल पाता तो निःसनदेह एक बहुत बडी योजना आज हमारे सामने विद्यमान होती ।’ डा. आंबेडकर ने भारत की राष्ट्भाषा ्या हो, इस पर अपना मत देते हुए संस्कृत को राष्ट्भाषा बनाने का प्सताव किया था । डा. आंबेडकर अपने ज्ान व अनुभव के कारण हिनदू व मुकसलमों की पूरी पूरी आबादी की भारत एवं पाकिसतान में अदला-बदली के समर्थक थे । पाकिसतान बनने पर वहां के मुकसलमों ने दलित हिनदुओं को वहां बलपूर्वक रोक लिया था, जिससे वह उनका मल-मूत्र आदि साफ कर सकें ।
महर्षि दयाननद के जव्यात अनुयायी लाला लाजपतराय से आपके गहरे आतमीय समबनध थे । यही कारण था कि अंग्ेजों के बरबरतापूर्ण लाठी प्हार से लाला जी की मृतयु होने पर उनहोंने उनहें अश्ुपूर्ण शबदों में श्द्धांजलि दी थी । डा. आंबेडकर जनवरी, 1913 में बडौदा आये थे और यहां उनका दलितोद्धार का कार्यकरने वाले आर्यसमाज के विद्ान पं. आतमाराम अमृतसरी जी से परिचय हुआ । अमृतसरी जी उनहें उपयु्त निवास की वयवसथा होने तक अपने साथ आर्यसमाज वडोदरा में ले आये थे, जहां वह एक सपताह तक उनके साथ रहे थे । सवाभाविक है कि पं. आतमाराम अमृसरी और आर्यसमाज के इस सहवास एवं निकटता से डा. आंबेडकर को आर्यसमाज की विचारधारा को जानने व समझने का अवसर मिला होगा और उनहोंने आर्यसमाज के दैनिक सनधया एवं अग्निहोत्र सहित अनय गतिविधियों को भी देखा एवं समझा होगा । साथ ही इनको करने के कारणों एवं होने वाले लाभों को भी जाना होगा । �
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